प्यारी माँ

rajaarkey
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प्यारी माँ

Postby rajaarkey » 07 Nov 2014 20:27

नैनन में है जल भरा, आँचल में आशीष।
तुम-सा दूजा नहि यहाँ, तुम्हें नवायें शीश।।

कंटक सा संसार है, कहीं न टिकता पाँव।
अपनापन मिलता नहीं, माँ के सिवा न ठाँव।।

रहीं लहू से सींचती, काया तेरी देन।
संस्कार सारे दिए, अदभुद तेरा प्रेम।।

रातों को भी जागकर, हमें लिया है पाल।
ऋण तेरा कैसे चुके, सोंचे तेरा लाल।।

स्वारथ है कोई नहीं, ना कोई व्यापार।
माँ का अनुपम प्रेम है, शीतल सुखद बयार।।

जननी को जो पूजता, जग पूजै है सोय।
महिमा वर्णन कर सके, जग में दिखै न कोय।।

माँ तो जग का मूल है, माँ में बसता प्यार।
मातृ-दिवस पर पूजता, तुझको सब संसार।।


rajaarkey
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Re: प्यारी माँ

Postby rajaarkey » 07 Nov 2014 20:29

तू विधाता का अनमोल उपहार है
अब तो तुझमे बसा मेरा संसार है
मेरी आँखों का तारा तो बन ही गया
दिल का टुकडा है तू प्यार ही प्यार है
बातें कितनी ही करनी है तुझसे मुझे
तेरी नटखट क्रियाओं की चाहत मुझे
अपने आँचल में तुझको छिपा लूंगी मैं
अब न तेरे सिवा चाहिए कुछ मुझे
जब खिलाऊँगी तुझको मेरे लाडले
मेरा बचपन भी जीवंत हो जाएगा
जब करूँगी मैं सेवा तेरी तो मुझे
अपनी माँ का वही प्यार याद आयेगा
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Re: प्यारी माँ

Postby rajaarkey » 07 Nov 2014 20:30

मैंने देखा था कल शाम तुझे फिर से रोते हुए...
अपने गहरे ज़ख्मों को फिर नमक के पानी से धोते हुए...!

क्या लगता है के मैं कुछ नहीं जनता...
तेरे मासूम चेहरे पर बनी इन लकीरों को नहीं पहचानता...!

तेरी छाती से उतरे दूध को पिया है मैंने...
हर पल जब तू मरी वो हर पल तेरे साथ जिया है मैंने...!

यहाँ खड़ा हूँ इस चलते तूफ़ान के बीच...
तुने ही तो कहा था की इन पौधों को लहू से सींच...!

फिर भी पता नहीं के क्या मैं कर पाउँगा...
बस येही मालूम है की बेटा हूँ तेरा और यहीं मर जाऊंगा...!

मेरी भी तो माँ ने ही भेजा है मुझको तिलक लगा कर...
जाते हुए को बोली थी वापिस मत आना यहाँ पीठ दिखाकर...!

हाँ मैं देख रहा हूँ की वो बढे आ रहे हैं...
उनकी रफ़्तार ही ऐसी है की मेरे नाते सब बिछड़ते जा रहे हैं...!

अच्छा माँ देख मुझे अब फ़र्ज़ बुला रहा है...
खून का यह कैसा दौरा है उबलता ही जा रहा है...!

तेरी आँखों के आंसू तो शायद मैं न पोंछ सकूँगा...
लेकिन आज अगर मैं नहीं कट्टा तो अपने घर भी तो नहीं जा सकूँगा...!

माँ बस मेरी माँ से कहना की तेरा बेटा लौटा नहीं...
अब भी सरहद पे ही पड़ा है बुलाती हूँ तो बोलता ही नहीं...!

कहना की वो बिलकुल नहीं डरा और मुझे छोड़ कर नहीं भागा...
लड़ लड़ के मरा है हमारा बेटा फौजी था न के अभागा...!

हाँ लोगो तुम भी मुझे शहीद ही बुलाना...
इस माँ की खातिर मंज़ूर है पड़े जो हर इक माँ को रुलाना...!

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