वर्ष २०१२, नॉएडा की एक घटना (सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

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Re: वर्ष २०१२, नॉएडा की एक घटना (सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

Postby admin » 12 Nov 2016 12:56

इबार की वो ख़ुश्बू, भीनी भीनी सी, वहाँ मौजूद थी, अब मैं समझ गया था, कि ये ज़रूर एक जिन्नाती मामला था! और ये भी, कि मुझ से पहले वो आदमी आये थे यहां वो क्यों मार खा के गए थे! अब देखना ये था, कि वो जिन्न किस तबक़े से त'आलुक़्क़ात रखता है! जिसके फेर में ये लड़की, सुरभि पड़ गयी है! हम अंदर आ चुके थे, बैठे, पूरे घर में इबार की ख़ुश्बू फैली थी! मैंने वहां, तब ही, कलुष-मंत्र जागृत किया, और नेत्र किये पोषित, अपने भी और शर्मा जी के भी, छोटा बैग अपने साथ में ही रखा, ये ज़रूरी भी था, अभी तक सभी यहां से, मार खा के गए थे, इसीलिए, सुरभि के माता-पिता जी, अभी भी संशय में ही थे, मैंने उनको ढांढस बंधाया, चिंता न करने की सलाह दी!
"ले चलिए सुरभि के पास!" कहा मैंने,
"आइये" बोले वो,
और हम चल पड़े,
उसके कमरे तक पहुंचे,
सुरभि को आवाज़ दी,
उसने दरवाज़ा खोला,
और पहली बार मैंने उस सुरभि को देखा,
बेहद सुंदर लड़की है वो,
उसका बदन ऐसा सजीला और यौवन से भर गया था कि,
जो एक बार देखे, सो देखता रह जाए,
आँखें ऐसी सुंदर, कि नज़र हटे ही नहीं उस से,
रूप-रंग बेहद गोरा था, हाथ लगाओ, मैली हो, ऐसी है सुरभि!
उसने हमें देखा,
और आने दिया अंदर,
उस ऐतबार था फ़ैज़ान पर,
अब तक कुछ न हुआ तो अब क्या होगा,
कनखियों से देखा, मुस्कुराई वो!
वो बिस्तर पर जा बैठी,
और हम, वहीँ कुर्सियों पर,
उसके पिता जी को मैंने, बाहर भेज दिया था!
वो बिस्तर पर बैठ, हमें देख रही थी!
और मैं उसके हाव-भाव को!
उसे कोई डर न था, कैसा भी,
"सुरभि नाम है तुम्हारा?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"और उसका?" पूछा मैंने,
वो चौंकी!
आँखें चौडीं कीं,
"किसका?" पूछा मैंने,
"तुम्हारे उस आशिक़ जिन्न का!" का मैंने,
मैं जान गया था, ये जानकर, वो थोड़ा परेशान हुई!
नै बोली कुछ भी,
"बताओ?" कहा मैंने,
"चले जाओ यहां से?" बोली वो,
गुस्सा आ गया था उसे मेरे सवाल से!
"तुम बता दोगी तो ठीक है, नहीं तो मैं ही बुला लूँगा उसे!" कहा मैंने,
वो थोड़ा और परेशान हुई!
मैं यही चाहता था!
"बुलाओ?" कहा मैंने,
"जाओ यहां से?" अब ज़ोर से बोली वो,
"सुन लड़की! आराम से सुन! तू बुलाती है, या मैं ही बुलाऊँ?" कहा मैंने,
वो खड़ी हो गयी!
और मैं भी खड़ा हुआ,
चला उसकी तरफ! रुका पास जाकर!
"बुलाती है या?" धमकाया मैंने!
वो थोड़ा और परेशान हुई!
"ठीक है, मैं ही बुलाता हूँ!" कहा मैंने,
मैं जानता था, कि कोई भी जिन्न किसी भी पराये मर्द को हाथ नहीं लगाने देगा, किसी भी सूरत पर उसे! और यही तोड़ था मेरे पास!
मैंने एक ही झटके से उसके बाल पकड़ लिया,
उमेठ दिए, उसने हाथ-पाँव चलाये अपने,
लेकिन उसका सर, ऐसे मोड़ा था मैंने कि,
वो कुछ कर नहीं सकती थी! शर्मा जी खड़े हो गए थे!
और तभी हमारी कुर्सियां घिसट चलीं!
वो पलंग, हिलने लगा!
आया एक हवा का तेज झोंका अंदर!
खिड़की के पल्ले बज उठे तेज!
"छोड़ दो उसे!" गूंजी आवाज़ एक!
भारी, मर्दाना आवाज़!
और वहीँ उसी के पास, एक जिन्न हाज़िर हुआ!
मैंने छोड़ दिया उसे!
मक़सद पूरा हो चुका था मेरा!
झट से लपक कर, उसके सीने जा लगी सुरभि!
मैंने पहली बार उसे देखा था उस दिन!
बेहद ख़ूबसूरत है वो!
काले कुर्ते में था वो, नीली आँखें, सुनहरी बाल,
घुंघराले, चौड़ा सीना और मज़बूत जिस्म!
जिस्म के सभी बाल भी सुनहरे थे!
अपने सीधे हाथ में, एक अंगूठी पहने हुआ था वो,
नीला सा पत्थर जड़ा था उसमे!
हल्की सी दाढ़ी और मूंछें,
वो भी सुनहरी,
नीचे, सलवार, नीले रंग की,
पांवों में जूतियां, सुनहरी रंग की और उस पर सोने का काम हुआ, हुआ था!
सुरभि उसके कंधे से भी नीचे थी,
आधी छाती तक ही,
उसके दोनों कंधों को, एक ही बाजू से ढका था उसने,
सुरभि कोई, गुड़िया सी लग रही थी उसके सामने!
"चलें जाएँ आलिम साहब, गुज़ारिश है" बोला वो,
मैं तो सन्न रह गया!
उसकी महबूबा को, एक तरह से मैंने तंग ही किया था,
लेकिन वो, बजाय गुस्से के, गुज़ारिश कर रहा था!
जान गया था मेरे इल्मात के बारे में,
उसने इज़्ज़त बख़्शी थी मुझे और मेरे इल्मात को!
मैं इसीलिए सन्न रह गया था!
पहली नज़र में, मुझे वो, एक भला और नेक जिन्न लगा!
"क्या नाम है तुम्हारा?" पूछा मैंने,
"फ़ैज़ान आलिम साहब" बोला वो,
"कहाँ से हो?" पूछा मैंने,
"यमन के सहरा से, वहाँ से त'आलुक़्क़ात है हमारा" बोला वो,
"क्यों इस लड़की के पीछे पड़े हो?" पूछा मैंने,
"पीछे नहीं पड़े आलिम साहब, ऐसा कह, आप हमारी मुहब्बत को नाजायज़ न ठहराएं" बोला वो,
बेहद नज़ाक़त से बात कर रहा था वो!
एक एक अलफ़ाज़, जैसे छन के आता था उसके मुंह से!
"कैसी मुहब्बत फ़ैज़ान? ये मुहब्बत कहाँ है? सिर्फ इसके जिस्म से मुहब्बत है तुम्हे!" कहा मैंने,
उसने ये सुन, अपने आँखें बंद कीं!
और फिर खोलीं,
"जिस्म से हमने मुहब्बत नहीं की, आप अपने अलफ़ाज़ वापिस लें, हमने इनके बजूद से मुहब्बत की है!" बोला वो,
"कैसा वजूद फ़ैज़ान? हम आदमजात मिट्टी हैं, और तुम आतिश, अब भला क्या मेल? कैसे जायज़ हुई ये मुहब्बत?" पूछा मैंने,
"काश कि हम आदमजात होते, काश कि हमें कोई जिन्न की जगह न जानता, इसका हमें अफ़सोस है, हम, आप यक़ीन मानें आलिम साहब, मिट्टी बन कर ही इनसे मुहब्बत करते हैं" बोला वो,
वो आदमजात बनने को भी राजी था!
ये सच में मुहब्बत थी?
या फिर, महज़ जोश?
उसने मुझे मज़बूर किया सोचने पर!
"कौन से जिन्न हो तुम फ़ैज़ान?" पूछा मैंने,
"हम ताहेला हैं" बोला वो,
ताहेला! अव्वल क़िस्म के जिन्न!
बेहद ताक़तवर! बेहद त'आलीमयाफ्ता जिन्न!
ख़लील के बराबर! यूँ कहें, उस से भी ज़रा ऊपर!
यमन, जौरडन आदि देशों में ये रहते हैं!
ये मददग़ार जिन्न हैं,
कई रेगिस्तानी क़बीले इनको बेहद मानते हैं!
"फ़ैज़ान?" कहा मैंने,
"जी, फ़रमायें?" बोला वो,
"ज़रा सा सोचो तुम?" बोला मैं,
"इशारा करें?" बोला वो,
"तुम ताहेला हो! तुम्हे एक से एक महबूबा मिलेगी! तुम्हारी ही क़िस्म में, कोई कमी नहीं,
और वो जायज़ भी है, ये एक आदमजात है, इसके क़ायदे-क़ानून अलग है तुमसे, इसे वहां कोई नहीं क़ुबूलेगा और तुम्हें, यहां कोई नहीं क़ुबूलेगा!" कहा मैंने,
"बजा फ़रमाया आपने आलिम साहब! हम आपकी बात, नहीं काट रहे, जो आपने कहा, ठीक कहा, लेकिन, हम एक-दूसरे को क़ुबूल हैं, और ये ही मुहब्बत है!" बोला वो,
"ये कोई मुहब्बत नहीं है!" कहा मैंने,
"तो आप बताएं, क्या है?" पूछा उसने,
"ये ज़बरदस्ती है, इस लड़की के साथ, ये असरात में है!" कहा मैंने,
"नहीं आलिम साहब! कोई असरात नहीं, कोई ज़बरदस्ती नहीं!" बोला वो,
"है फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
"मान लो फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
वो चुप हुआ,
सर पर हाथ फेरा सुरभि के,
और चूम लिया सर उसका!
वो सच में, बेपनाह मुहब्बत करता है उस से!
"एक बात कहें? इजाज़त दें?" बोला वो,
"ज़रूर फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
"वो मोहतरमा तन्वी साहिबा और वो जनाब ख़लील, उनका क्या?" पूछा उसने,
ताड़ गया था वो!
मैं जानता था,
वो ज़िक्र करेगा इसका, कर दिया!
"देता हूँ जवाब!" कहा मैंने,
"जी!" बोला वो,
"मैंने उसको असरात से जुदा रखने को कहा था, रखा गया! और ख़लील से मेरा क़ौल बंधा था, इसीलिए, मुझे हटना पड़ा!" कहा मैंने,
"यही तो हम कह रहे हैं आलिम साहब!" बोला वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"इन पर, कोई असरात नहीं हैं!" बोला वो,
"तुम नहीं जानते शायद! या जानबूझकर अनजान हो!" कहा मैंने,
"हम, बखूबी जानते हैं!" बोला वो,
"एक बात जानते हो?" बोला मैं,
"जी बताएं?" बोला वो,
"मैं चाहूँ, तो तुम, चाहकर भी, इस से नहीं मिल सकते!" कहा मैंने,
"जानते हैं हम!" बोला वो,
"फिर भी नहीं डर लगा रहा?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
कमाल था!
मुझे दुबारा हैरत में डाला उसने!
"कैसे डर नहीं फ़ैज़ान?" पूछा मैंने,
"एक वजह है!" बोला वो,
मुस्कुराते हुए!
"कैसी वजह?" पूछा मैंने,
"आप नेक-दिल इंसान हैं! इसीलिए नहीं डर लग रहा!" बोला वो,
ओह!
उसने तो मुझे हो नाप दिया था!
मुझे ही मेरे अंदर तुलवा दिया था!
उसका ऐसा यक़ीन मेरे ऊपर?
"नहीं फ़ैज़ान! मुझे इंसानी क़ायदे के लिए, ऐसा करना होगा!" कहा मैंने,
"आप नहीं कर पाएंगे!" बोला वो,
"ऐसा यक़ीन?" पूछा मैंने,
"ऐसा नहीं आलिम साहब, पक्का यक़ीन!" बोला वो,
उसने, तब, उस सुरभि को,
लिटा दिया बिस्तर पर, आराम से,
जैसे किसी गुड़िया को लिटाया हो बिस्तर पर,
और फिर देखा मुझे, मुस्कुराते हुए!
"हम चार बरस से, इनकी मुहब्बत दिल में पाले हुए हैं आलिम साहब!" बोला वो,
"बे-बुनियाद मुहब्बत!" कहा मैंने,
वो मुस्कुराया!
"आपके लिए, ये बे-बुनियाद ही सही आलिम साहब! हमारे लिए, हमारे वजूद के मायने हैं!" बोला वो,
आवाज़ में, दम था! बोलने में, दृढ़-संकल्प था! आत्म-विश्वास था!
उसकी मुहब्बत उसके लिए उसका वजूद थी!
मुझे ये बात बहुत अंदर तक, डरा गयी थी,
और फ़ैज़ान पर, कुछ विश्वास भी आया!
ज़िद्दी होना उनका स्वभाव होता है!
ये तो फ़ितरत है उनकी!
और, जिस पर रजू हुए, तो समझो ग़ुलाम हुए उसके,
कुछ भी कर गुजरेंगे वो उसके लिए!
और जिस पर गुस्सा हुए,
तो ऐसा खाना-खराब करेंगे कि, अच्छे से अच्छा आलिम भी,
चक्कर खा जाए! सुलझाये न सुलझे!
और यहां तो मुहब्बत थी!
अब इस से बड़ी चीज़ और क्या होगी एक जिन्न के लिए!
और तभी एक और ख़ुश्बू उठी वहाँ!
और हाज़िर हुई एक जिन्नी!
बला की ख़ूबसूरत!
नक़ाबनशीं चेहरा!
झीनी हरी नक़ाब!
बाल सुनहरे! जिस्म बला का ख़ूबसूरत!
सर पर, बैंगनी रंग का एक कपड़ा बाँधा हुआ था!
आँखें बड़ी बड़ी, और रंग दूध सा सफेद!
आँखें हरी, आग सी लगे देखने में उसकी आँखें!
उसका हुस्न ऐसा तेज-तर्रार, कि छूते ही उसे,
खुद ही लहूलुहान हो जाए कोई भी इंसान!
मैं तो देखता ही रह गया उसे!
उसने, आते ही, फ़ैज़ान की बाजू पकड़ ली! और देखने लगी मुझे,
"ये ह'ईज़ा है आलम साहब, हमारी छोटी बहन!" बोला वो,
उसने मुझे देखा और सर हिलाया अपना,
"और ह'ईज़ा, ये आलिम साहब हैं, नेकदिल इंसान हैं बेहद!" बोला वो,
ऐसा बोलता था वो,
तो मैं अंदर से दरकने लगता था!
मैं उन्हें अलग करने आया था, उनका मेल बढ़ाने नहीं!
"आप जाएँ ह'ईज़ा!" बोला मैं,
वो चौंक पड़ी!
"जाएँ, न इन्हें कोई ख़तरा, और न मुझे! इत्मीनान रखें!" कहा मैंने,
"जी! ह'ईज़ा, आप जाएँ, परेशान न हों!" बोला फ़ैज़ान, ह'ईज़ा को देखते हुए!
ह'ईज़ा मुस्कुराई, और हो गयी ग़ायब!
अब आगे आया वो, मेरे सामने,
मेरे से भी लम्बा था वो, बेहद गोरा,
जिन्नाती खूबसूरती का मालिक था वो!
"जनाब, एक दरख़्वास्त है!" बोला वो, शर्मा जी से,
"फ़रमायें फ़ैज़ान?" बोले शर्मा जी,
"हम ज़रा वक़्त लेंगे आलिम साहब का, ज़रा अकेले हो सकेंगे हम?" पूछा उसने,
अब शर्मा जी ने, मुझे देखा,
और मैंने इशारा किया, उन्हें, जाने का!
वे चले गए बाहर, और मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया,
"आप बैठ जाएँ इत्मीनान से!" बोला फ़ैज़ान,
मैंने शुक्रिया किया उसका, और बैठ गया!
अब संजीदा हुआ वो,
मुझे देखा, फिर, सुरभि को देखा, सर पर हाथ फिराया उसके,
"हम बखूबी जानते हैं आलिम साहब, कि आप किसलिए आये हैं! और आप ऐसा कर भी देंगे, हम मानते हैं, हमने अपनी परवाह नहीं, हम, पत्थर बन जाएंगे, गुमनामी में वक़्त काट लेंगे अपना, इनकी यादें बहुत हैं हमारे लिए, एक एक लम्हा, इधर क़ैद है मेरे!" बोला, सीने पर हाथ रखते हुए,
फिर, सुरभि के सर पर हाथ रखा उसने,
"हाँ, तो हम कह रहे थे, हमें अपनी परवाह नहीं, हम तो अपनी मुहब्बत का इज़हार ही न करते, बस, एक नज़र इनको अपनी नज़रों में रखते! हमारी बहनें ही न मानीं आलिम साहब, नहीं तो हम कभी न आते! और आलिम साहब, हम इतने भी कमज़र्फ नहीं, कि हम आपके संग इल्माती-जंग लड़ें! नहीं! और न ही इतने ओछे हैं कि आपको हम दौलत, औरत, शौहरत वग़ैरह की पेशक़श करें!" बोला वो,
कितना सुलझा हुआ था फ़ैज़ान!
एक एक अलफ़ाज़ में सच्चाई!
कोई लाग-लपेट नहीं!
साफ़गोई! उसकी साफ़गोई का जैसे मैं उसी लम्हे, क़ायल हो गया था!
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Re: वर्ष २०१२, नॉएडा की एक घटना (सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

Postby admin » 12 Nov 2016 12:56

उसकी शख़्सियत अब भारी पड़ने लगी थी मेरे ऊपर!
"बात पूरी करें आप फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
मैंने आप कहा था उसे अब!
वही, उसकी भारी शख़्सियत!
"जी, ज़रूर, तो हमारा मतलब था, हम तो क़ुर्बान हैं ही, और भी कुबानी दे देंगे इनके लिए, लेकिन जो सबसे ज़्यादा हमें डराता है, वो है, कि इनको अगर दुःख हुआ, आंसू आये, तो सच में, हम पर लानत ठहरेगी! ये पुकारेंगी, हम न आएंगे, हम तो तड़प जज़्ब कर लेंगे, लेकिन ये नहीं, ये बेहद भोली हैं, दिल, साफ़ है इनका, कोरे सफ़े की मानिंद, ज़हनियत, पानी के मानिंद साफ़ है इनकी, शख़्सियत, आसमान की मानिंद, बड़ी है, अब आपसे इल्तज़ा है इस ना-वजूद फ़ैज़ान की, कि जो करें, जो भी करें आप, वो, इनकी सलामती के लिए करें, आपसे यही दिली-इल्तज़ा है!" बोला गया वो!
उसके इन अल्फ़ाज़ों ने, छान दिया था मुझे!
मेर रूह तक को झिंझोड़ दिया था!
मैं क्या कहता!
और क्या नहीं!
क्या बचा कहने के लिए,
और क्या नहीं!
मैंने आगे हाथ बढ़ाया,
उसने एक झटके से हाथ आगे किया,
मैंने उसका हाथ पकड़ा,
उसमे ही अंगूठी पहने था वो!
मैंने अंगूठी छुइ उसकी,
उसने फौरन ही, वो अंगूठी उतार दी!
"लीजिये!" बोला वो,
सोने की थी,
मेरी तो दो उँगलियों में आती!
हीरा लगा था उसमे,
काले रंग का!
झिलमला रहा था रौशनी में!
"रख लीजिये आप!" बोला वो,
बेहद ही सीधा और सच्चा है वो फ़ैज़ान!
"नहीं फ़ैज़ान!" बोला मैं,
"ऐसा न सोचें, ये आपके लायक नहीं तो, अभी लीजिये!" बोला वो,
और तेज भभका उठा तभी!
किसी की आमद हुई थी यकायक!
और हाज़िर हुआ,
एक आतशी हुस्न!
लाल रंग के लिबास में लिपटा हुआ था वो हुस्न!
सफेद, शफ़्फ़ाफ़ रंग!
सुगठित देह,
लाल, झीनी नक़ाब!
उन सुर्ख लाल होंठों पर!
आँखें, ऐसी कि क़ज़ा डोले उनमे!
पलकें ऐसी, कि जैसे दूज का चाँद!
लाल रंग की ही,
सोने से खची चुस्त सलवार!
कोई देख ले उसे तो,
उसका जीना मुहाल हो जाए उसी लम्हे से!
उसने, एक पोटली दी फ़ैज़ान को,
फ़ैज़ान ने ली,
"आलिम साहब! ये मेरी छोटी बहन हैं, अशुफ़ा, ह'ईज़ा से बड़ी हैं!" बोला वो,
अशुफ़ा ने सर हिलाया अपना,
मुस्कुराई वो,
"और अशुफ़ा, ये आलिम साहब हैं! बेहद नेक-दिल इंसान हैं!" बोला वो,
मैं तो और गहरा धंसा!
ये क्या समझ रहा है फ़ैज़ान?
उसने डोरी ढीली कर दी पोटली की,
और देने के लिए हाथ बढ़ाया अपना आगे!
"ये लीजिये आलिम साहब!" बोला वो,
"नहीं फ़ैज़ान!" बोला मैं,
"आप रख लें! गुज़ारिश है!" बोला वो,
मैंने ली वो पोटली!
काले रंग की थी,
मैंने डोरी खींची उसकी,
पोटली खुली,
मैंने हाथ डाला उसमे!
अंगूठियां ही अंगूठियां!
बेहद सुंदर!
लाजवाब!
काले, नीले, सफेद, गुलाबी आदि हीरे, बड़े बड़े!
मुस्कुराया फ़ैज़ान!
"ऐसा क़तई न समझें आप, कि इसके बदले आपसे कुछ मांगेंगे हम!" बोला वो,
"आपका शुक्रिया!" कहा मैंने,
और वो अंगूठियां वापिस पोटली में डाल दीं,
मैंने बढ़ाया हाथ अपना!
"लीजिये फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
वो मायूस हुआ!
नहीं पकड़े उसे!
अशुफ़ा को देखे!
"आप ऐसा न समझें! ये मेरे किसी काम के नहीं!" मैंने कहा,
"आप, रख तो लें?" बोली अशुफ़ा!
"नहीं अशुफ़ा!" कहा मैंने,
"आपको पसंद नहीं?" बोली वो,
"ऐसा भी नहीं!" कहा मैंने,
"घर के लोगों को दे दें!" बोली अशुफ़ा!
"नहीं अशुफ़ा!" कहा मैंने,
ले ली पोटली!
दी अशुफ़ा को!
"हुक़्म करें आप!" बोला वो,
"कोई हुक़्म नहीं फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
"आप तक़ल्लुफ़ न करें! बताएं!" बोला वो,
मैं चुप हुआ!
उसको देखा,
वो मुस्कुराया!
"अशुफ़ा?" बोला मैं,
"जी, हुक़्म!" बोली वो,
"आप जाएँ!" कहा मैंने,
"हाँ, आप जाएँ अशुफ़ा!" बोला फ़ैज़ान!
और वो,
मुस्कान बिखेर, हुई ग़ायब!
"एक बात बोलें हम?" बोला वो,
"बोलें फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
"आप, ज़रा देर के लिए, मामूल हो जाएँ!" बोला वो,
मामूल!
साधारण!
मैं ज़रा देर के लिए,
आलिम न रहूँ!
"आप ऐतबार करें!" बोला वो,
मैं मुस्कुराया!
"आपको अगर ऊँगली भी छुए मेरी, या बाल, कपड़ा भी हिले, तो आपको क़ौल दिया, क़ैद कर लें हमें आप!" बोला वो,
ऐसा यक़ीन उसका!
वे झूठ नहीं बोलते!
कभी सीखा ही नहीं!
फ़रेब नहीं करते!
सच्चे हुआ करते हैं!
"ठीक है फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
"आपके भी हम एहसानमंद हुए आलिम साहब!" बोला वो,
और उठा तब!
वो उठा वो और सुरभि का माथा छुआ,
फिर मेरे पास आया, हाथ किया आगे,
मुझे देखा, मुस्कुराया,
"इजाज़त दें?" बोला वो,
"ज़रूर!" कहा मैंने,
और उसने मेरे माथे से हाथ छुआया!
अन्धकार सा छाया, और मैं कुर्सी पे ही झूल गया!
जैसे सो रहा हूँ उस पर!
मैं मामूल था उस वक़्त, इसीलिए ऐसा हुआ था!
मैंने उस पर, यक़ीं कर लिया था, ये जिन्न झूठ नहीं बोलते,
इनकी फ़ितरत में झूठ नहीं,
ख़ासतौर पर, ऐसे जिन्न! जैसा ये फ़ैज़ान!
और फिर मेरी आँख खुलीं!
खुलीं तो अपने आपको मैंने, एक नख़लिस्तान के करीब पाया,
पेड़ लगे थे, जुन्नार और खजूर के,
उनके नीचे ही मैं बैठा था!
और कोई भी नहीं था वहां!
मैं अकेला ही था, मैंने हर तरफ देखा,
कोई नहीं था वहां, दूर दूर तक कोई नही!
मेरे सामने झाड़ियाँ लगी थीं,
और उन्ही झाड़ियों के पीछे से मुझे कुछ हंसी-ठिठोली की आवाज़ें आयीं!
मैं चला उधर, पार की झाड़ियाँ,
तो मुझे, सुरभि और फ़ैज़ान दिखाई दिए!
सुरभि, उस फ़ैज़ान को, रेत के टीले से, धक्का दे रही थी!
धक्का दिया और वो लुढ़कता चला गया नीचे!
किसी इंसान की तरह!
और सुरभि, ये देख खूब हँसे!
खूब हँसे, ऐसे हँसे, जिसे देख, मेरी भी हंसी छूट गयी!
वो नीचे गिर पड़ा था!
अपनी दोनों बाजुएं आगे कीं उसने,
और सुरभि भागी नीचे उसकी तरफ!
जा लेटी फ़ैज़ान के ऊपर!
और फ़ैज़ान ने, अपनी गिरफ़्त में लिया उसे!
उसका माथा चूमा!
और उठा लिया उसको ऊपर!
खुद भी उठ गया था साथ में!
उसको अपनी गोद में लिए, चला जा रहा था आगे आगे!
सुरभि उसकी गरदन में हाथ डाल,
बातें किये जा रही थी!
रुका वो, मुझे देखा एक बार, मुस्कुराया,
मैं समझ गया, मुझे उनके पीछे चलना था!
वो ले चला उसे,
एक बात कमाल थी!
सुरभि मुझे नहीं देख पा रही थी!
कुछ दिखाना चाहता था फ़ैज़ान मुझे!
आगे चलता गया वो, और मैं पीछे पीछे,
एक कुआँ पड़ा वहां,
उसने सुरभि को नीचे खड़ा किया,
और गया कुँए तक,
रस्सी खींची और फिर उसमे बंधी एक देग़, नीचे डाली,
निकाला पानी, लाया पानी सुरभि के पास,
एक हाथ से वो देग़ पकड़, और दूसरे हाथ से सुरभि के हाथ,
रगड़ रगड़ के साफ़ कर दिए उसने,
और फिर पानी पिलाया उसको,
पानी अपने हाथ में लिया,
और सुरभि का चेहरा भी धो दिया!
सुरभि हंस रही थी उस वक़्त!
उसकी खनकती हंसी, आ रही थी मेरे पास तक!
फिर उसने, अपनी जेब से कपड़ा निकाला,
हाथ और मुंह पोंछ दिए उसके,
और फिर खुद ने पानी पिया!
रख दी देग़ वहीँ कुँए की मुंडेर पर,
मुझे देखा उसने, मुस्कुराया!
वो चला उसका हाथ पकड़ कर,
बीच में रुक गया,
सुरभि के बालों में शायद को पत्ता आदि था,
वही निकाल रहा था वो,
इतने में, मैं कुँए तक पहुंचा,
और उस देग़ से, पानी पिया!
पानी का स्वाद, बेहद अलग था! सच में,
प्यास उसी से बुझती थी!
सारी थकावट चूर हो जाए, ऐसा पानी था!
वे दोनों फिर से चल पड़े आगे,
सुरभि उसकी कमर में, मुक्के मारते जा रही थी!
और वो, उन मुक्कों से कुम्हला जाता था!
वे आगे चले और मैं उनके पीछे!
ठीक सामने, तम्बू लगे थे!
ऊँट बंधे थे उधर!
वे आ गए थे तम्बू तक,
फ़ैज़ान ने मुझे देखा, मुस्कुराया,
और उसके साथ, अंदर चला गया!
मेरा किसी ने हाथ छुआ, माँ पलटा,
ये ह'ईज़ा थी, खींच ले चिली मुझे,
ले आई एक तम्बू में,
बिठाया उसने मुझे,
पानी दिया,
हम्दा भी दिया, और खिच्चा भी!
मैं वो हम्दा खाता रहा,
ह'ईज़ा, मुझे ही देखती रही!
मेरी नज़र उस से मिलती,
तो वो मुस्कुरा देती!
आँखों में, एक डर सा वाबस्ता था उसके!
"इजाज़त दें, तो हम कुछ बोलें?" बोली वो,
"ज़रूर!" कहा मैंने,
"सुरभि और फ़ैज़ान भी, बेहद मुहब्बत करते हैं एक-दूसरे से!" बोली वो,
"जानता हूँ!" कहा मैंने,
"आप उनको अलग कर देंगे?" पूछा उसने,
"ऐसा सोच तो रहा हूँ!" कहा मैंने,
उसने लम्बी सी सांस भरी!
और अपनी छाती पर हाथ रख लिया!
आँखें फ़ैल गयीं!
डर अब, खुल के सामने आ गया!
"ऐसा न करें आप?" बोली, इल्तज़ा भरे लहजे से!
"आप समझिए!" कहा मैंने,
"समझाइये?" बोली वो,
"आप आतिश हैं, और हम मिट्टी! फ़ना होने वाले!" कहा मैंने,
"तो" बोली वो,
"तो? ऐसा मुमकिन कैसे होगा?" कहा मैंने,
"कैसे नहीं है?" बोली वो,
"कैसे है?" पूछा मैंने,
"आप सब जानते हैं, हमसे भी ज़्यादा!" बोली वो,
मैं मुस्कुराया!
"ज़रा पानी दीजिये?" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
उठी, और ले आई पानी!
दिया मुझे,
मैंने लिया, और पिया, किया गिलास वापिस उसे!
"ये लीजिये?" बोली वो,
हम्दा आगे करते हुए,
"शुक्रिया" कहा मैंने,
"खुशामदीद!" बोली वो,
फिर से घूरा उसने मुझे,
और अपने कान से,
नक़ाब खोल ली,
उसके होंठ देख,
मैं तो झनझना गया!
शफ़्फ़ाफ़ चेहरे पर,
कान्धारी अनार के से रंग के होंठ!
दहकते होंठ!

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