वर्ष २०१२, नॉएडा की एक घटना (सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

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Re: वर्ष २०१२, नॉएडा की एक घटना (सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

Postby admin » 12 Nov 2016 12:58

एक आतशी, मिट्टी के लिए बर्फ़ बन गया था!
"जानता हूँ ह'ईज़ा!" कहा मैंने,
"कुछ कीजिये आप" बोली वो,
"जो कर सकता हूँ, कर रहा हूँ!" कहा मैंने,
"हमें यक़ीन दिलाइए आप" बोली वो,
"ह'ईज़ा, कहने की ज़रूरत ही नहीं!" कहा मैंने,
रखा उसके सर पर हाथ,
"जाओ ह'ईज़ा!" कहा मैंने,
उसने घूरा मुझे,
ज़रा सा मुस्कुराई,
और हो गयी ग़ायब!
ह'ईज़ा, एक भाई के लिए, कैसे बेचैन थी!
ऐसे ही बेचैन थे सुरभि के परिजन!
फंसा था तो मैं बीच में उनके,
किस को देखूं,
और किसको दरकिनार करूँ!
ऐसे ही ख़यालों में,
सारी रात बीत गयी!
नींद भी टुकड़ों में ही आई थी!
अगली सुबह, फोन बजा मेरा,
ये शर्मा जी का था,
मेरी बात हुई, और खबर पता चली कि,
सुरभि सुबह चार बजे से अस्पताल में भर्ती थी,
शर्मा जी आ रहे थे मेरे पास, आधे घंटे में ही,
मैं तैयार हुआ तब ही,
चाय-नाश्ता किया, हल्का-फुल्का,
तब तक शर्मा जी आ गए थे,
और मैं उनके साथ चल दिया, अस्पताल,
हम पौने घंटे में जा पहुंचे,
सुरभि के माता-पिता और भाई, सभी खड़े थे,
चिंतित से, बेहद परेशान थे,
उसके पिता जी आये हमारे पास,
नमस्ते हुई हमारी उनसे,
"क्या हुआ सुरभि को?" पूछा मैंने,
"खाना तो खा ही नहीं रही थी वो, कुछ नहीं बोलती थी, चुपचाप पड़ी रहती थी, कल सुबह, उसके रोने की तेज आवाज़ आई, हम भागे, दरवाज़ा खुला था, वो पलंग से नीचे गिरी हुई थी, बेहोश..." बोले वो,
"अब होश में है?" पूछा मैंने,
"नहीं" बोले वो,
"डॉक्टर क्या कहते हैं?" पूछा मैंने,
"उसको आई.सी.यू. में रखा गया है" बोले वो,
अब क्या करते?
आ गए वापिस,
इतना ही कहा, कि सम्पर्क में रहें हमारे साथ,
जो भी हो, बताया जाए,
मित्रगण,
वो तीन दिन रही अस्पताल में,
घर लाया गया उसे,
वजन, गिरने लगा,
कहती कुछ थी नहीं,
आंसू, सूख चले थे उसके,
चेहरे पर, झाइयाँ पड़ गयीं,
माता जी, कुछ खिलातीं, तो कुछ खाती,
फिर रोती, माँ से, पिता से, उसके फ़ैज़ान के पास ले जाने के लिए कहती!
अब, सब, और परेशान!
हम तक रोज सुबह-शाम खबर आती रही,
मुझे बेहद दुःख होता था,
लेकिन मैं, मज़बूर था,
पढ़ाई छूट गयी,
सहेलियाँ घर आयीं,
तो पहचान न सकी!
एक महीना बीत गया,
ह'ईज़ा, रोज आती मेरे पास,
फ़ैज़ान का हाल बताती,
सुरभि का हाल पूछती!
मित्रगण!
और फिर वही हुआ!
जिसका सबसे बड़ा डर था,
वो, विक्षिप्त हो गयी,
डॉक्टर्स ने घोषित कर दिया,
घर में, मातम सा छा गया,
उसका वजन केवल सैंतीस किलो रह गया,
अब न उठा जाता, न बैठा जाता,
आँखें गड्ढों में घुस गयीं!
वो, चिल्ला चिल्ला के, हम्दा मांगती!
अलक़श मांगती, वो पानी मांगती, घर का पानी न पीती!
उसको झूठ बोलकर, पानी पिलाया जाता कि,
ये पानी वहीँ का है,
तब वो एक दो घूँट पीती,
आये दिन अस्पताल में भर्ती होती,
उसको फ़ूड-पाइप से खाना दिया जाता,
कोई दवा असर न करती,
मित्रगण,
तो मर रही थी,
तिल तिल भर, रोज, हर लम्हे!
उस वक़्त जब देखा था मैंने,
तो मैं काँप गया था अंदर तक!
वो सिर्फ एक कंकाल मात्र थी!
उस रोज,
उसके घर में बैठे हे हम,
सुरभि के पिता जी, टूट गए थे,
माता जी, जैसे काठ बन गयी थीं,
"मर जायेगी सुरभि, मेरी बेटी....." बोले पिता जी,
सर को पकड़ते हुए! फूट-फूट कर,
माँ-बाप दोनों ही रो पड़े!
मैंने हिम्मत बंधाई उनको,
"आइये मेरे साथ, सुरभि नहीं मरेगी!" कहा मैंने,
वे चौंक उठे!
"आइये" कहा मैंने,
और मैं चला पड़ा सुरभि के कमरे में,
वे भी आ गए उधर!
मैं, कुर्सी पर बैठ गया!
सुरभि की हालत, बेहद खराब थी,
छाती से, घर्र-घर्र की सी आवाज़ आ रही थी!
एक वक़्त की वो,
चहकती,
अल्हड़ सी,
अप्सरा सी,
उछलती-कूदती,
आज,
बिस्तर में पड़ी थी!
मेरे दिल में हूक उठ गयी,
टीसें उठ आई थीं,
चेहरे की,
गले की हड्डियां निकल आई थीं!
उँगलियों में, गांठें नज़र आ रही थीं!
अगर फ़ैज़ान देख लेता उसको ऐसे,
तो क़हर मचा देता वो!
तहस-नहस कर देता!
ज़मीन फाड़ देता!
ऐसा चिल्लाता कि सामने वाले उड़ जाएँ!
"मेरी बेटी को बचा लीजिये!" बोले वो,
हाथ जोड़ते हुए!
"सुनिए, फैंसला आपको ही लेना है" कहा मैंने,
उन्होंने सर हिलाया,
"अगर सुरभि मर जाती है, तो भी वो, कहाँ जायेगी, आप जानते हैं" कहा मैंने,
फिर से सर हिलाया,
"आपने क्या सोचा?" पूछा मैंने,
वे, फिर से रो पड़े!
"मेरी बेटी!" चिल्लाये वो,
जा बैठे वहाँ,
सुरभि के पास,
उसका हाथ पकड़ा, झूल रहा था हाथ उसक!
उसकी माँ,
उसके पाँव पकड़, रोये जा रही थीं,
सुरभि, चुपचाप, बेसुध पड़ी थी,
उसकी किताबें,
कनखियों से उसको देखे जा रही थीं,
वो कुर्सी, इंतज़ार में थी उसके,
वो खिड़की,
कब से न खुली थी,
वो चाँद,
आते तो थे, लेकिन, वे भी तलाशते रहते थे उसे,
घंटों खिड़की के सामने आ कर आकाश में!
मैंने तब, ह'ईज़ा को पुकारा!
मन ही मन,
हाथ आगे बढ़ाया,
मुट्ठी बंद की अपनी,
मुट्ठी में,
ठंडी सी कोई चीज़ आई,
मैंने मुट्ठी खोली अपनी,
दो फूल!
दो छोटे, नीले फूल!
मुझे सब याद आ गया!
मित्रगण!
उस लम्हे,
मेरी आँखों से,
पानी छलकने लगा!
मैं खड़ा हुआ, आंसू पोंछे,
और उस सुरभि के, सिरहाने रख दिए,
सुरभि के माता-पिता, देखते रहे, कुछ न बोले!
और अगले ही पल!
सुरभि ने आँखें खोल दीं!
उठ बैठी वो!
उठाये वो, पहले मुस्कुराई,
आंसू निकले, आँखों से,
और चिल्ला के तीन नाम पुकारे!
"अशुफ़ा! ह'ईज़ा! फ़ैज़ान! हमें ले जाओ! हम मर जाएंगे!"
चीख चीख के बोली वो,
उसकी इन चीखों ने, मेरा सीना ही उधेड़ दिया!
माँ-बाप को पहचाने नहीं!
उनसे, बचे! रोये ही जाए!
न देखा गया मुझसे! मैं, शर्मा जी को ले, बाहर चला आया कमरे से!
दम घुटने लगा था मेरा उस पल!
वो अंदर कमरे में दहाड़ें मार रही थी,
और इधर मेरा दिल फ़टे जा रहा था!
मैं भी अंदर ही अंदर, सूखे जा रहा था,
टूट रहा था मैं अंदर ही अंदर, उसकी चीखों से,
दिल को चीरे जा रही थीं उसकी चीखें!
मैं अंदर गया,
और उसके पिता जी को लाया बाहर,
माता जी, सुरभि को भींच, रोये जा रही थीं,
"हम चलेंगे अब" कहा मैंने,
"कुछ कीजिये आप?" बोले गिड़गिड़ाते हुए,
"सुनिए, उसके ऊपर अगर कोई जिन्नाती असरात होते, तो मैं ज़रूर कुछ करता, उसके ऊपर ऐसा कुछ भी नहीं है, ये सब उसका अपना ज़हन करवा रहा है, वो खोयी हुई है, उस पर कुछ शक्ति-प्रयोग करना, नियम के विरुद्ध है, आप उसको समझाएं, जितना समझा सकते हैं" बोला मैं,
वे रो पड़े,
बुरी तरह से,
अपनी क़िस्मत की दुहाई देने लगे!
"वो, सुनती ही नहीं?" बोले वो,
और तभी भागी हुई आयीं सुरभि की माँ,
बदहवास सी, घबराई हुईं सी,
बोली कुछ नहीं, तो हम भागे अंदर कमरे में,
सुरभि बिस्तर पर पड़ी थी,
मुंह से खून निकल रहा था,
साँसें बेहद तेज चल रही थीं उसकी,
लेकिन बेहोश थी वो,
माता-पिता घबरा गए थे, लाजमी था,
मैंने उसकी नब्ज़ ढूंढी, उसको सदमा लगा था,
पिता जी ने, फ़ोन कर दिया अपने एक भतीजे को,
वो पांच मिनट में ही गाड़ी ले आया,
उसको उठाया, और गाड़ी में डाल लिया गया,
आर गाड़ी दौड़ पड़ी अस्पताल की तरफ!
हम भी पहुंचे अस्पताल,
दाख़िल कर लिया गया था,
डॉक्टर्स ने बताया कि फ़ूड-पाइप फट गया है,
अंदरूनी रक्त-स्राव हो रहा है,
कोशिश की जा रही है,
अगले अड़तालीस घंटों में, कुछ भी सम्भव है!
पहाड़ टूट पड़े थे!
वे सब, रोये ही जाएँ!
मैंने कंधे पर हाथ रखा उनके,
और लाया एक तरफ,
"रोते क्यों हैं?" पूछा मैंने,
वे और ज़ोर से रो पड़े!
"उसने मरना ही है!" कहा मैंने,
"नहीं नहीं, ऐसा मत कहिये....." बोले वो,
"आप ज़िंदा देखना चाहते हैं उसे? पहले जैसा?" पूछा मैंने,
आशय समझ गए मेरा वो!
"कई बार ऐसे फैंसले लेने पड़ते हैं, अपनी नियति खुद चुनी है उसने!" बोला मैं,
वे सुबक उठे,
उनकी पत्नी भी चली आई थीं,
काँप रही थीं,
"ग्यारह दिन और, फिर उसके बाद सुरभि, 'थी' हो जायेगी!" कहा मैंने,
क्या करते वो?
क्या बचा था अब?
कम से कम,
उसको जीवित तो देखते!
कौन माँ-बाप अपनी संतान को,
जीते जी, 'जाता' देख सकता है!
कोई नहीं!
कोई भी नहीं!
"जानता हूँ, फैंसला लेना मुश्क़िल है! एक बार फिर से सोचें! और आंसूओं को संभाल कर रखें, न जाने......" बोलते बोलते रुक गया मैं!
वे एकटक देखें मुझे,
"अब चलेंगे हम" कहा मैंने,
"रुकिए" बोले वो,
अपनी पत्नी को देखा,
और फिर मुझे, दोनों ने!
"हमें स्वीकार है" बोले वो,
मैं मुस्कुरा पड़ा!
उन्होंने कहा ही था कि,
मुझे ठीक सामने, हु'मैद दिखाई दिए!
मुझे देख, मुस्कुराये वो,
और हुए ग़ायब!
"जाइए, हम यहीं खड़े हैं! खबर लाइए, सुरभि की!" कहा मैंने,
वे चौंके,
और दौड़ पड़े अंदर!
माता जी भी, भागीं अंदर!
और कोई दस मिनट के बाद,
खबर आ गयी!
सुरभि ठीक हो गयी थी!


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Re: वर्ष २०१२, नॉएडा की एक घटना (सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

Postby admin » 12 Nov 2016 12:59

अब कोई रक्त-स्राव नहीं था!
हाँ, आराम की सख़्त ज़रूरत थी!
वे प्रसन्न हो उठे!
और हम, उसी अस्पताल से अपने स्थान के लिए,
वापिस हो लिए, सारे रास्ते, यही सब घूमता रहा दिमाग़ में!
वहां पहुंचे हम
शाम को, खाना-पीना हुआ!
शर्मा जी लौट गए थे,
और मैं, सोने चला गया था!
रात को, कोई दो बजे,
मुझे महक आई!
मैं उठ बैठा, तभी के तभी!
ये एक अलग सी महक थी,
और जो हाज़िर हुआ, वो फ़ैज़ान था!
मुस्कुराता हुआ,
हाज़िर होते ही, गले से लगा मेरे!
"सुरभि से मिले?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"दस रोज़ बाकी हैं!" बोला वो,
"हाँ! हैं!" बोला मैं,
"आलिम साहब! कैसी हैं वो?" पूछा उसने,
"हु'मैद से नहीं पूछा?" पूछा मैंने,
"नहीं, हम अलहैदा ही रहते हैं" बोला वो,
"ठीक है आपकी सुरभि!" कहा मैंने,
उसने एक लम्बी सांस ली!
"चलते हैं, सुक़ून हुआ! आपका बेहद शुक्रिया आलिम साहब!" बोला वो, और ग़ायब हुआ!
मैं फिर से,
पीछे यादों में लौटने लगा था!
बैठ गया बिस्तर पर,
और तभी,
वो ह'ईज़ा हायर हुई!
मुस्कुराते हुए!
और लपक कर,
गले से लग गयी!
"आलिम साहब! यही उम्मीद थी आपसे!" बोली वो,
मैं मुस्कुरा पड़ा!
"ह'ईज़ा! सुरभि का शुक्रिया करो आप! मेरा नहीं!" कहा मैंने,
"हक़ीक़त का ज़रिया आप ही हैं!" बोली वो!
"नहीं! मैं फ़क़त, एक तमाशबीन!" कहा मैंने,
"ऐसा न कहें!" बोली वो,
"आपके फ़ैज़ान भाई आये थे!" कहा मैंने,
"कब" चौंकते हुए पूछा उसने,
"अभी!" कहा मैंने,
"मज़बूर हैं, क्या करें!" बोली वो,
"हूँ! सच कहा!" कहा मैंने,
"क्या हम अब जा सकते हैं सुरभि के पास?" पूछा उसने,
"हाँ! रास्ता खुल गया है!" कहा मैंने,
वो फिर से गले लगी!
भींचा मुझे!
माथे पर चूमा,
और हुई ग़ायब!
मित्रगण!
इसे कहते हैं जिन्नाती-कारनामा!
दस दिनों में,
सुरभि,
पहले जैसी हो गयी!
बदन भर गया,
आभा जाग उठी!
रूप-रंग, निखर गया!
वही पुरानी सुरभि, लौट आई थी!
घर में, खुशियाँ लौट आई थीं फिर से!
ग्यारहवां दिन!
उस सुबह उठी सुरभि!
गुसलखाने गयी!
फिर से वही दो फूल!
उस मुस्कुराई!
स्नान किया,
वस्त्र पहने, केश संवारे!
उस रोज उसे कक्षा में जाना था!
हमारे वहां पहुंचने तक,
वो जा चुकी थी!
पूरे घर में महक ही महक थी!
अब माता-पिता भी खुश थे उसके!
वे स्वीकार कर चुके थे वो सच!
उन्होंने जो फैंसला लिया,
उस से जान बच गयी थी सुरभि की!
हम वहां से, चले वापिस,
और उस दिन शाम को,
दुबारा आये वहां!
मैं सुरभि से मिला!
उसने अब गुस्सा न किया!
बल्कि, मेरा धन्यवाद किया!
वो सुरभि,
जिसे मैंने पहले देखा था,
अब बदल चुकी थी!
और सबसे बड़ी बात,
वो एक महीना और बीस दिन,
उसकी यादों से,
ग़ायब हो चले थे!
और मुझे, तब इंतज़ार था, फ़ैज़ान का! उस रोज़, आना था उसे!
वो शाम के साथ बजे का वक़्त था!
वो कमरा, ख़ुश्बू के मारे, भभक रहा था!
बेहतरीन ख़ुश्बू थी, हर जगह!
मैं कुर्सी पर बैठा था, और वो सुरभि, अपने पलंग पर,
हमारे दरमियान कोई बातचीत न हुई थी,
हाँ, मैं उस लड़की को देख रहा था,
जिस से एक जिन्न रजू हुआ था, एक जिन्न! फ़ैज़ान!
जिसकी शख़्सियत, बेहद वजनी और दमदार थी!
उसके जवाब, ज़हन में आये सारे सवालों को.
किसी मौज से नहाये किनारों पर बनी लकीरों को जैसे,
एक बार में ही, किसी मौज की मानिंद साफ़ कर दिया करते थे!
वो ज़हनी, ईमानदार, संजीदा और अपने क़ौल का, पक्का था!
कोई ठीक सवा सात बजे,
प्रकाश कौंधा!
मेरी आँखें बंद हुईं!
हाथ कर लिए आगे मैंने,
और जब, मंद हुआ प्रकाश,
तो आँखें खोलीं!
सफेद रंग के कुर्ते में, सोने के तारों से जड़ा था वो,
उसमे , गोटे से जड़े थे, नीले रंग के!
पाजामी भी वैसी ही थी,
गर्दन में, एक चमकीले हरे रंग का कपड़ा पड़ा था!
सुनहरी बाल, कानों को छिपाए हुए थे!
आँखें, नीली, चमक रही थीं!
और वो सुरभि,
उस से चिपक गयी थी!
वो सुरभि की कमर में, हाथ बांधे खड़ा था!
उस रूप देख कर तो मैं भी दंग रह गया!
यूनान के देवता एडोनिस को मैं, खुद,
सामने देख रहा था! ऐसा रौशनी वाला, चमकदार रूप था उसका!
वो मुस्कुरा रहा था!
उसने, सर पर हाथ फेरा सुरभि के,
और लिटा दिया, बिस्तर पर आहिस्ता से,
वो सो गयी थी! गहरी नींद में!
आया मेरे पास, उसके गोटों में से, जैसे संगीत सा निकला!
मुझे देखा,
मुस्कुराया,
मेरा हाथ पकड़ा,
और चूम लिया!
उसके बाद, वही बोला, "इजाज़त है?"
मैं मुस्कुरा पड़ा!
और किया सर आगे!
उसने लगाया हाथ, अँधेरा छाया,
और जब आँखें खुलीं,
तो रात का वक़्त था वो!
थोड़ा आगे, अलाव जल रहा था!
सुरभि ने देखा फ़ैज़ान को,
फ़ैज़ान ने, किया हाथ आगे,
और सुरभि भाग छूटी!
दौड़ती हुई चली गयी!
फ़ैज़ान रुक गया!
मैं भी रुक गया!
"आलिम साहब!" बोला वो,
मेरे दोनों हाथ, अपने हाथों में पकड़ कर!
"आपके एहसानों का बदला, हम कभी नहीं उतार सकते! बस इतना कहेंगे, ग़र ये नाचीज़ ज़िंदगी में कभी नौकर भी बने आपका, तो आपको अपनी कमर से ग़ुजरवा देंगे!" बोला संजीदगी से!
मैं हंस पड़ा!
पहली बार खिलखिलाकर हंसा!
"ऐसी बड़ी बड़ी बातें, फ़ैज़ान भाई, कहाँ से सीखी हैं?" बोला मैं!
"दो बातें!" बोला वो,
"कहिये!" कहा मैंने,
"एक तो आपने हमें भाई कहा, इसके लिए हम आपको सर झुका कर शुक्रिया करते हैं! और दूसरा ये, कि हमें कहाँ से सीखीं, तो जवाब कुछ यूँ आलिम साहब, हम जो कुछ भी सीखते हैं, वो हमें हमारे वालिदैन से मिलता है, बुज़ुर्गों से मिलता है! हमें उनका, हमेशा मान रखना चाहिए!" बोला वो,
मैंने कहा था न!
फ़ैज़ान और दूसरे जिन्नात से अलग है!
उस जैसा मैंने कोई नहीं देखा!
और शायद, देखूं भी नहीं!
"फ़ैज़ान! आप बेहद, बेहद ही अलग हो!" कहा मैंने,
हाथ कस लिया था उसका मैंने!
"शुक्रिया!" बोला वो,
"अच्छा फ़ैज़ान?" बोला मैं,
"जी!" बोला वो,
"अगर मैं, इस सहरा में, कभी फिर, आना चाहूँ तो, कैसे आ सकता हूँ?" पूछा मुस्कुरा कर मैंने,
"आप, हुक़्म कीजियेगा! हम, फ़ैज़ान, उसी लम्हे, आपके पास हाज़िर होंगे!" बोला वो,
अब न रुकी मुस्कुराहट!
इतना भोला, इतना सादा!
मैंने गले से लगा लिया उसे!
चूम लिए उसके हाथ!
"आइये!" बोला वो,
और हम पहुँच गए वहां!
सभी थे वहाँ!
सभी ने, जैसे मेरा ख़ैर-मक़्दम किया!
सुरभि तो, ह'ईज़ा और अशुफ़ा में ही खोयी रही!
पता नहीं क्या क्या बता रही थी उनको!
और वो भी, टकटकी लगाये, कान खड़े किये, सुने जा रही थीं उसे!
दावत थी!
हो गयी!
मैं उठा, हाथ धुलवाए मेरे,
मैंने पोंछ लिए!
"अब चलूँगा फ़ैज़ान!" कहा मैंने,
वो मुस्कुराया!
"आपके, हम, हमेशा एहसानमंद रहेंगे!" बोला वो,
आखिरी बार, सुरभि को देखा,
वो तो गले मिल उनसे, हंसती जा रही थी!
बे'दु,ईं हो चली थी!
उसने मेरे सर पर हाथ फेरा,
और मेरी नींद खुली!
मेरी आँखें खुलीं!
सामने, बिस्तर पर,
सुरभि,
न थी!!
मैं मुस्कुरा पड़ा!
आया बाहर, बंद किया दरवाज़ा,
उसके माँ-बाप से बात की,
और हम चले वापिस फिर!
मित्रगण!
आज दो बरस के करीब, वक़्त गुजर गया!
सुरभि की पढ़ाई पूरी हो गयी! अव्वल दर्ज़े से!
वो अब डॉक्टर बन गयी! एक सरकारी अस्पताल में एस.आर. है अब!
सुरभि का भाई, इंजीनियर बन गया, दक्षिण भारत में है आजकल!
सुरभि के माता-पिता अब आराम से हैं!
घर में कोई कष्ट नहीं है!
सुरभि घर में ही रहती है!
मेरी आखिरी मुलाक़ात उस से इस साल मार्च में हुई थी,
उसके भाई के विवाह में!
ह'ईज़ा, आती रहती है मेरे पास! खूब बातें करती है!
मैं, उसके बाद एक बार और, उस सहरा में गया!
फ़ैज़ान, कुल तीन बार मिला मुझसे!
मेरी विवशता कहिये या कमी,
उस वक़्त मैंने वही किया, जो मेरे हिसाब से जायज़ था!
हाँ, वो फ़ैज़ान!
उसे नहीं भूल सकता मैं!
रेगिस्तान के बारे में, ये सूक्ष्म जानकारी, मुझे फ़ैज़ान ने ही दी!
आज दोनों, खुश हैं!
बेहद खुश!

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