बंसरी का जीवन 1
Posted: 21 Feb 2026 18:48
अध्याय 1: अप्सरा की छिपी आग – भव्य विवाह और सुहागरात की पहली चिंगारी
3 मार्च, शुक्रवार की रात।
रात के ठीक 11:40 बजे।
शहर के सबसे शानदार पाँच सितारा होटल "ग्रैंड पैलेस" के विशाल ग्रैंड बॉलरूम में शादी का रिसेप्शन अपने चरम पर था।
हॉल की ऊँची छत से लटकते क्रिस्टल झूमरों की रोशनी हीरे की तरह चमक रही थी। हर झूमर में हजारों छोटे-छोटे क्रिस्टल टुकड़े एक-दूसरे से टकराकर इंद्रधनुषी रंग बिखेर रहे थे। दीवारें मखमली लाल और सुनहरी कपड़ों से सजी हुई थीं, जिन पर हाथ से कढ़ी हुई मोतियों की मालाएँ लहरा रही थीं। फर्श पर सफेद और गुलाबी गुलाबों की पंखुड़ियाँ बिछी हुई थीं, हर कदम पर महक उठ रही थी। हवा में चंदन, गुलाब और महँगे इत्र की मीठी-तीखी खुशबू घुली हुई थी। दूर कोने में एक लाइव बैंड धीमे-धीमे शहनाई और सितार की धुन बजा रहा था, जिसकी लय हर किसी के सीने में उतर रही थी।
लगभग सभी मेहमान विदा हो चुके थे। बचे हुए थे सिर्फ़ कुछ खास रिश्तेदार, करीबी दोस्त और परिवार के लोग। मंडप अब भी भव्य था – चारों तरफ़ गेंदे, चमेली और राजनिगंधा के फूलों के तोरण, बीच में स्वर्णिम कलश, और ऊपर से गिरता हुआ फूलों का झरना। हल्की-हल्की धूप की रोशनी मंडप को स्वर्गीय बना रही थी।
ठीक उसी समय दूल्हा और दुल्हन सात फेरे पूरे कर रहे थे।
दूल्हा रोहन कसाना – उम्र 33 साल। लंबा कद, चौड़े कंधे, गोरा रंग, नुकीली नाक और गहरी आँखें। सिर पर रेशमी पगड़ी, जिस पर मोतियों का कलगी जड़ा था, और शरीर पर क्रीम कलर की भारी ज़रीदार शेरवानी, जिसमें सोने के बटन चमक रहे थे। वह चेन्नई में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन पूरा परिवार नॉर्थ इंडियन कसाना खानदान का था। उसकी चाल में आत्मविश्वास था, लेकिन आज उसकी आँखों में सिर्फ़ एक ही चीज़ थी – बंसरी।
और दुल्हन... बंसरी नागर।
वह किसी स्वर्ग की अप्सरा से कम नहीं थी। उसका बदन दूध की तरह शुद्ध गोरा, इतना चिकना कि रोशनी उस पर फिसल जाती थी। कद सिर्फ़ 5 फीट 3 इंच, वजन महज़ 52 किलोग्राम, लेकिन उसका फिगर... 32-24-35।
32 इंच के भरे-भरे, उभरे हुए स्तन, जो चुस्त ब्लाउज़ में भी हिलते-डुलते थे।
24 इंच की पतली कमर, बिल्कुल सुराही जैसी, जिसे कोई भी हाथ दो हिस्सों में पकड़ सकता था।
35 इंच के गोल, मोटे, पीछे की तरफ़ उभरे हुए नितंब, जो लहराते हुए चलती थी तो हर आँख ठहर जाती थी।
उसके बाल घने, गहरे काले, सीधे उसके नितंबों तक लहराते हुए। आँखें काली, गहरी, जैसे काजल की दो झीलें। होंठ गुलाबी, नाक नुकीली, और चेहरा इतना निष्पाप कि देखने वाला पल भर के लिए भूल जाता था कि उसके अंदर क्या-क्या छिपा है।
उसके मोहल्ले में तो उसकी खूबसूरती की चर्चा हर घर में थी। लड़के सड़क पर खड़े होकर सीटी बजाते, "भाई साहब, ये तो माल है... एक बार देख लो तो रात भर नींद नहीं आएगी!"
बड़े-बड़े आदमी, जो उम्र में उसके पिता के बराबर थे, चुपके से उसकी ओर ताकते और फुसफुसाते, "क्या चूत है यार... देखने में तो संस्कारी लगती है, लेकिन अंदर से तो आग है।"
शहर के कॉलेज लड़के उसके नाम पर झगड़े करते, फेसबुक पर उसके फोटो चोरी-छिपे सेव करते। कोई कहता, "बंसरी को देखकर तो लंड खड़ा हो जाता है भाई... 25 साल की है, लेकिन 18 की लगती है।"
दुकानदार, रिक्शेवाले, ऑफिस वाले – हर कोई एक बार उसे देख लेने के बाद रात को अपनी बीवी को कल्पना करके चोदता। लेकिन कोई नहीं जानता था कि बंसरी ने 25 साल की उम्र में ही 200 से ज़्यादा मर्दों के लंड अपनी चूत और गांड में झेल लिए हैं। हर उम्र के – 18 के लड़के से लेकर 65 के बूढ़े तक। हर तरह के – मोटे, पतले, लंबे, छोटे।
नाम में ही छुपा था उसका स्वभाव – बंसरी। बजाना उसे बहुत पसंद था... और वो न सिर्फ़ बांसुरी, बल्कि हर उस चीज़ को बजाना जानती थी जो उसके अंदर घुस सकती थी।
जब पहली बार उसकी भाभी ने उसके लिए एक लंबे-मोटे लंड का इंतज़ाम किया था, उसी दिन से उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तब से लेकर आज तक उसने संभोग के हर सुख को चख लिया था – गैंगबैंग, थ्रीसम, आउटडोर, होटल, कार, यहाँ तक कि ट्रेन की बर्थ पर भी।
लेकिन बाहर से? एकदम संस्कारी, शर्मीली, घर की इज्जत वाली कन्या।
फेरे खत्म होते ही मंत्रोच्चार के साथ "सप्तपदी समाप्त" की घोषणा हुई। शहनाई फूट पड़ी। लोग तालियाँ बजाने लगे।
विदाई का समय आया।
बंसरी अपनी भाभी की गोद में सिर रखकर रोई। आँसू असली थे, लेकिन उन आँसुओं के पीछे छिपी मुस्कान किसी को नहीं दिखी। वह जानती थी – अब नई ज़िंदगी शुरू होने वाली है।
ससुराल उसके शहर से 100 किलोमीटर दूर दूसरे शहर में था। कारों का काफ़िला रात में डेढ़ घंटे तक चलता रहा। सुबह के 6 बजे जब वे पहुँचे थे, पड़ोसियों ने भी उसका स्वागत किया था ।
बंसरी के ससुराल में ज़्यादा लोग नहीं थे – सास- ससुर, जेठ-जेठानी, उनके 10 साल का बेटा और 8 साल की बेटी। नंद की शादी चार साल पहले हो चुकी थी, उसके एक साल की प्यारी सी बेटी भी थी। सबने नई बहू का ढोल-नगाड़े के साथ स्वागत किया। आरती उतारी गई, पैरों में दूध-दही से छिड़काव हुआ। बंसरी मुस्कुराते हुए सबके पैर छू रही थी।
पूरे दिन घर में कार्यक्रम चले – पूजा, हवन, गिफ्ट खोलना।
रात के 11 बजे तक सब थककर सो गए।
रोहन का पुराना कमरा शादी के लिए खास तौर पर सजाया गया था।
कमरे में सफेद रोशनी, बेड पर लाल चादर, चारों तरफ़ गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी हुईं। हवा में अगरबत्ती और महँगे इत्र की खुशबू। ए सी की ठंडी हवा में भी गर्मी थी।
बंसरी पलंग पर बैठी हुई थी।
लाल साड़ी में, ब्लाउज़ का पल्लू थोड़ा सरका हुआ, माथे पर सिंदूर, मंगलसूत्र चमक रहा था। बाल खुले, आँखों में काजल, होंठों पर हल्का लिपस्टिक। वह इंतज़ार कर रही थी।
दरवाज़ा खुला। रोहन अंदर आया।
उसने दरवाज़ा बंद किया, चिटकनी लगाई और पलंग के पास आकर बैठ गया।
रोहन (धीमी, काँपती आवाज़ में): "बंसरी... तुम इस लाल साड़ी में... सच में स्वर्ग की अप्सरा लग रही हो। इतनी खूबसूरत... कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि तुम अब मेरी हो।"
बंसरी (मुस्कुराते हुए, आँखों में शरारत): "साड़ी में सुंदर लग रही हूँ... या बिना साड़ी के इमेजिन करके कह रहे हो?"
यह कहते हुए वह आगे बढ़ी। दोनों हाथों से रोहन के चेहरे को पकड़ा और अपने गुलाबी होंठ उसके होंठों पर रख दिए।
यह उनका दूसरा किस था।
पहला किस तभी हुआ था जब रोहन उसे देखने घर आया था। उस दिन भी बंसरी ने ही पहल की थी। रोहन के लिए वो पहला किस था किसी लड़की का। वह पागल हो गया था। उसी रात उसने फैसला कर लिया था – यही लड़की चाहिए।
अब किस गहरा होता गया।
जीभें एक-दूसरे में उलझ गईं। बंसरी की जीभ रोहन की जीभ को चाट रही थी, चूस रही थी, उसके मुँह के हर कोने को छू रही थी। रोहन के हाथ उसकी पीठ पर फिर रहे थे।
कुछ ही देर में दोनों के हाथों ने एक-दूसरे के कपड़े उतारने शुरू कर दिए।
साड़ी की पिन खुली, ब्लाउज़ के हुक टूटे, पेटीकोट की नाड़ी खुली। रोहन की शेरवानी, कुर्ता, बनियान – सब फर्श पर गिर गए।
बस रोहन का काला अंडरवियर बचा था।
बंसरी पूरी तरह नंगी हो चुकी थी।
दूधिया गोरा बदन, भरे हुए 32 इंच के स्तन हवा में लहरा रहे थे। गुलाबी निप्पल्स खड़े होकर रोहन को ललचा रहे थे। पतली कमर, गोल नाभि, और नीचे साफ़ चूत – बिल्कुल बाल रहित, गुलाबी।
रोहन अभी भी किस में खोया था। जब उसकी साँस फूलने लगी तो उसने मुँह हटाने की कोशिश की। लेकिन बंसरी ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और और गहरा किस किया। उसकी जीभ रोहन की जीभ को लपेटे हुए थी, उसके मुँह के अंदर घुस-घुसकर चाट रही थी।
आखिरकार रोहन ने हाँफते हुए खुद को अलग किया।
और जैसे ही उसकी नज़र बंसरी के नंगे शरीर पर पड़ी – वह पागल हो गया।
"ओह माय गॉड... बंसरी..."
बंसरी ने मुस्कुराते हुए एक स्तन हाथ में उठाया, निप्पल को उँगलियों से दबाया और रोहन के मुँह के पास ले गई।
बंसरी (फुसफुसाते हुए, कामुक स्वर में): "चूसो न... अपनी बीवी के स्तन चूसो... जितना मन करे..."
रोहन ने जैसे भूखा शेर हो, दोनों हाथों से उसके स्तनों को पकड़ा और निप्पल मुँह में ले लिया। चूसने लगा, काटने लगा, चाटने लगा। बंसरी की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगीं – "आह्ह्ह... हाँ... और जोर से... काटो... चूसो..."
दोनों स्तनों को अच्छी तरह चूसने के बाद रोहन थक गया।
बंसरी ने उसके गले पर गहरी चुम्मा लिया, जीभ से चाटा और उसके कान में फुसफुसाई:
"अब तुम्हें मेरी चूत को शांत करना होगा... बहुत जल रही है... देखो न..."
यह कहते हुए वह पलंग पर लेट गई।
दोनों टाँगें उठाईं... और कंधों के पीछे ले गईं।
पूरी चूत और गांड का छेद खुलकर सामने आ गया।
यह पोज़िशन किसी आम लड़की के लिए असंभव थी, लेकिन बंसरी के लिए? यह रोज़मर्रा की बात थी। सालों के अभ्यास, योग और अनगिनत चुदाइयों ने उसे इतना लचीला बना दिया था।
रोहन की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसे बंसरी की गुलाबी चूत साफ़ दिख रही थी – भीगी हुई, चमक रही थी। ऊपर छोटा-सा क्लिटोरिस खड़ा था। नीचे टाइट गांड का छेद भी साफ़ नज़र आ रहा था।
यह पहली बार था जब रोहन ने इतने करीब से, इतनी खुलकर चूत और गांड देखी थी। उसने अभी तक यह सब पॉर्न में ही देखा था।
बिना देर किए वह नीचे झुका।
मुँह रखा और चाटने लगा।
अनाड़ी की तरह, लेकिन उत्साह से भरा।
बंसरी आँखें बंद करके सिसकार रही थी, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रही थी।
15 मिनट तक चाटने के बाद भी वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई थी।
वह तो सिर्फ़ गर्म हुई थी।
वह जानती थी – रोहन जैसे अनाड़ी के लिए उसकी चूत की गर्मी को झेलना, उसे पूरी तरह संतुष्ट करना लगभग असंभव था।
लेकिन रात अभी बहुत लंबी थी...
और बंसरी की छिपी हुई आग अभी सिर्फ़ चिंगारी थी।
(आपको यह अध्याय कैसा लग रहा है कमेंट करके बताएं)
3 मार्च, शुक्रवार की रात।
रात के ठीक 11:40 बजे।
शहर के सबसे शानदार पाँच सितारा होटल "ग्रैंड पैलेस" के विशाल ग्रैंड बॉलरूम में शादी का रिसेप्शन अपने चरम पर था।
हॉल की ऊँची छत से लटकते क्रिस्टल झूमरों की रोशनी हीरे की तरह चमक रही थी। हर झूमर में हजारों छोटे-छोटे क्रिस्टल टुकड़े एक-दूसरे से टकराकर इंद्रधनुषी रंग बिखेर रहे थे। दीवारें मखमली लाल और सुनहरी कपड़ों से सजी हुई थीं, जिन पर हाथ से कढ़ी हुई मोतियों की मालाएँ लहरा रही थीं। फर्श पर सफेद और गुलाबी गुलाबों की पंखुड़ियाँ बिछी हुई थीं, हर कदम पर महक उठ रही थी। हवा में चंदन, गुलाब और महँगे इत्र की मीठी-तीखी खुशबू घुली हुई थी। दूर कोने में एक लाइव बैंड धीमे-धीमे शहनाई और सितार की धुन बजा रहा था, जिसकी लय हर किसी के सीने में उतर रही थी।
लगभग सभी मेहमान विदा हो चुके थे। बचे हुए थे सिर्फ़ कुछ खास रिश्तेदार, करीबी दोस्त और परिवार के लोग। मंडप अब भी भव्य था – चारों तरफ़ गेंदे, चमेली और राजनिगंधा के फूलों के तोरण, बीच में स्वर्णिम कलश, और ऊपर से गिरता हुआ फूलों का झरना। हल्की-हल्की धूप की रोशनी मंडप को स्वर्गीय बना रही थी।
ठीक उसी समय दूल्हा और दुल्हन सात फेरे पूरे कर रहे थे।
दूल्हा रोहन कसाना – उम्र 33 साल। लंबा कद, चौड़े कंधे, गोरा रंग, नुकीली नाक और गहरी आँखें। सिर पर रेशमी पगड़ी, जिस पर मोतियों का कलगी जड़ा था, और शरीर पर क्रीम कलर की भारी ज़रीदार शेरवानी, जिसमें सोने के बटन चमक रहे थे। वह चेन्नई में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन पूरा परिवार नॉर्थ इंडियन कसाना खानदान का था। उसकी चाल में आत्मविश्वास था, लेकिन आज उसकी आँखों में सिर्फ़ एक ही चीज़ थी – बंसरी।
और दुल्हन... बंसरी नागर।
वह किसी स्वर्ग की अप्सरा से कम नहीं थी। उसका बदन दूध की तरह शुद्ध गोरा, इतना चिकना कि रोशनी उस पर फिसल जाती थी। कद सिर्फ़ 5 फीट 3 इंच, वजन महज़ 52 किलोग्राम, लेकिन उसका फिगर... 32-24-35।
32 इंच के भरे-भरे, उभरे हुए स्तन, जो चुस्त ब्लाउज़ में भी हिलते-डुलते थे।
24 इंच की पतली कमर, बिल्कुल सुराही जैसी, जिसे कोई भी हाथ दो हिस्सों में पकड़ सकता था।
35 इंच के गोल, मोटे, पीछे की तरफ़ उभरे हुए नितंब, जो लहराते हुए चलती थी तो हर आँख ठहर जाती थी।
उसके बाल घने, गहरे काले, सीधे उसके नितंबों तक लहराते हुए। आँखें काली, गहरी, जैसे काजल की दो झीलें। होंठ गुलाबी, नाक नुकीली, और चेहरा इतना निष्पाप कि देखने वाला पल भर के लिए भूल जाता था कि उसके अंदर क्या-क्या छिपा है।
उसके मोहल्ले में तो उसकी खूबसूरती की चर्चा हर घर में थी। लड़के सड़क पर खड़े होकर सीटी बजाते, "भाई साहब, ये तो माल है... एक बार देख लो तो रात भर नींद नहीं आएगी!"
बड़े-बड़े आदमी, जो उम्र में उसके पिता के बराबर थे, चुपके से उसकी ओर ताकते और फुसफुसाते, "क्या चूत है यार... देखने में तो संस्कारी लगती है, लेकिन अंदर से तो आग है।"
शहर के कॉलेज लड़के उसके नाम पर झगड़े करते, फेसबुक पर उसके फोटो चोरी-छिपे सेव करते। कोई कहता, "बंसरी को देखकर तो लंड खड़ा हो जाता है भाई... 25 साल की है, लेकिन 18 की लगती है।"
दुकानदार, रिक्शेवाले, ऑफिस वाले – हर कोई एक बार उसे देख लेने के बाद रात को अपनी बीवी को कल्पना करके चोदता। लेकिन कोई नहीं जानता था कि बंसरी ने 25 साल की उम्र में ही 200 से ज़्यादा मर्दों के लंड अपनी चूत और गांड में झेल लिए हैं। हर उम्र के – 18 के लड़के से लेकर 65 के बूढ़े तक। हर तरह के – मोटे, पतले, लंबे, छोटे।
नाम में ही छुपा था उसका स्वभाव – बंसरी। बजाना उसे बहुत पसंद था... और वो न सिर्फ़ बांसुरी, बल्कि हर उस चीज़ को बजाना जानती थी जो उसके अंदर घुस सकती थी।
जब पहली बार उसकी भाभी ने उसके लिए एक लंबे-मोटे लंड का इंतज़ाम किया था, उसी दिन से उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तब से लेकर आज तक उसने संभोग के हर सुख को चख लिया था – गैंगबैंग, थ्रीसम, आउटडोर, होटल, कार, यहाँ तक कि ट्रेन की बर्थ पर भी।
लेकिन बाहर से? एकदम संस्कारी, शर्मीली, घर की इज्जत वाली कन्या।
फेरे खत्म होते ही मंत्रोच्चार के साथ "सप्तपदी समाप्त" की घोषणा हुई। शहनाई फूट पड़ी। लोग तालियाँ बजाने लगे।
विदाई का समय आया।
बंसरी अपनी भाभी की गोद में सिर रखकर रोई। आँसू असली थे, लेकिन उन आँसुओं के पीछे छिपी मुस्कान किसी को नहीं दिखी। वह जानती थी – अब नई ज़िंदगी शुरू होने वाली है।
ससुराल उसके शहर से 100 किलोमीटर दूर दूसरे शहर में था। कारों का काफ़िला रात में डेढ़ घंटे तक चलता रहा। सुबह के 6 बजे जब वे पहुँचे थे, पड़ोसियों ने भी उसका स्वागत किया था ।
बंसरी के ससुराल में ज़्यादा लोग नहीं थे – सास- ससुर, जेठ-जेठानी, उनके 10 साल का बेटा और 8 साल की बेटी। नंद की शादी चार साल पहले हो चुकी थी, उसके एक साल की प्यारी सी बेटी भी थी। सबने नई बहू का ढोल-नगाड़े के साथ स्वागत किया। आरती उतारी गई, पैरों में दूध-दही से छिड़काव हुआ। बंसरी मुस्कुराते हुए सबके पैर छू रही थी।
पूरे दिन घर में कार्यक्रम चले – पूजा, हवन, गिफ्ट खोलना।
रात के 11 बजे तक सब थककर सो गए।
रोहन का पुराना कमरा शादी के लिए खास तौर पर सजाया गया था।
कमरे में सफेद रोशनी, बेड पर लाल चादर, चारों तरफ़ गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी हुईं। हवा में अगरबत्ती और महँगे इत्र की खुशबू। ए सी की ठंडी हवा में भी गर्मी थी।
बंसरी पलंग पर बैठी हुई थी।
लाल साड़ी में, ब्लाउज़ का पल्लू थोड़ा सरका हुआ, माथे पर सिंदूर, मंगलसूत्र चमक रहा था। बाल खुले, आँखों में काजल, होंठों पर हल्का लिपस्टिक। वह इंतज़ार कर रही थी।
दरवाज़ा खुला। रोहन अंदर आया।
उसने दरवाज़ा बंद किया, चिटकनी लगाई और पलंग के पास आकर बैठ गया।
रोहन (धीमी, काँपती आवाज़ में): "बंसरी... तुम इस लाल साड़ी में... सच में स्वर्ग की अप्सरा लग रही हो। इतनी खूबसूरत... कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि तुम अब मेरी हो।"
बंसरी (मुस्कुराते हुए, आँखों में शरारत): "साड़ी में सुंदर लग रही हूँ... या बिना साड़ी के इमेजिन करके कह रहे हो?"
यह कहते हुए वह आगे बढ़ी। दोनों हाथों से रोहन के चेहरे को पकड़ा और अपने गुलाबी होंठ उसके होंठों पर रख दिए।
यह उनका दूसरा किस था।
पहला किस तभी हुआ था जब रोहन उसे देखने घर आया था। उस दिन भी बंसरी ने ही पहल की थी। रोहन के लिए वो पहला किस था किसी लड़की का। वह पागल हो गया था। उसी रात उसने फैसला कर लिया था – यही लड़की चाहिए।
अब किस गहरा होता गया।
जीभें एक-दूसरे में उलझ गईं। बंसरी की जीभ रोहन की जीभ को चाट रही थी, चूस रही थी, उसके मुँह के हर कोने को छू रही थी। रोहन के हाथ उसकी पीठ पर फिर रहे थे।
कुछ ही देर में दोनों के हाथों ने एक-दूसरे के कपड़े उतारने शुरू कर दिए।
साड़ी की पिन खुली, ब्लाउज़ के हुक टूटे, पेटीकोट की नाड़ी खुली। रोहन की शेरवानी, कुर्ता, बनियान – सब फर्श पर गिर गए।
बस रोहन का काला अंडरवियर बचा था।
बंसरी पूरी तरह नंगी हो चुकी थी।
दूधिया गोरा बदन, भरे हुए 32 इंच के स्तन हवा में लहरा रहे थे। गुलाबी निप्पल्स खड़े होकर रोहन को ललचा रहे थे। पतली कमर, गोल नाभि, और नीचे साफ़ चूत – बिल्कुल बाल रहित, गुलाबी।
रोहन अभी भी किस में खोया था। जब उसकी साँस फूलने लगी तो उसने मुँह हटाने की कोशिश की। लेकिन बंसरी ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और और गहरा किस किया। उसकी जीभ रोहन की जीभ को लपेटे हुए थी, उसके मुँह के अंदर घुस-घुसकर चाट रही थी।
आखिरकार रोहन ने हाँफते हुए खुद को अलग किया।
और जैसे ही उसकी नज़र बंसरी के नंगे शरीर पर पड़ी – वह पागल हो गया।
"ओह माय गॉड... बंसरी..."
बंसरी ने मुस्कुराते हुए एक स्तन हाथ में उठाया, निप्पल को उँगलियों से दबाया और रोहन के मुँह के पास ले गई।
बंसरी (फुसफुसाते हुए, कामुक स्वर में): "चूसो न... अपनी बीवी के स्तन चूसो... जितना मन करे..."
रोहन ने जैसे भूखा शेर हो, दोनों हाथों से उसके स्तनों को पकड़ा और निप्पल मुँह में ले लिया। चूसने लगा, काटने लगा, चाटने लगा। बंसरी की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगीं – "आह्ह्ह... हाँ... और जोर से... काटो... चूसो..."
दोनों स्तनों को अच्छी तरह चूसने के बाद रोहन थक गया।
बंसरी ने उसके गले पर गहरी चुम्मा लिया, जीभ से चाटा और उसके कान में फुसफुसाई:
"अब तुम्हें मेरी चूत को शांत करना होगा... बहुत जल रही है... देखो न..."
यह कहते हुए वह पलंग पर लेट गई।
दोनों टाँगें उठाईं... और कंधों के पीछे ले गईं।
पूरी चूत और गांड का छेद खुलकर सामने आ गया।
यह पोज़िशन किसी आम लड़की के लिए असंभव थी, लेकिन बंसरी के लिए? यह रोज़मर्रा की बात थी। सालों के अभ्यास, योग और अनगिनत चुदाइयों ने उसे इतना लचीला बना दिया था।
रोहन की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसे बंसरी की गुलाबी चूत साफ़ दिख रही थी – भीगी हुई, चमक रही थी। ऊपर छोटा-सा क्लिटोरिस खड़ा था। नीचे टाइट गांड का छेद भी साफ़ नज़र आ रहा था।
यह पहली बार था जब रोहन ने इतने करीब से, इतनी खुलकर चूत और गांड देखी थी। उसने अभी तक यह सब पॉर्न में ही देखा था।
बिना देर किए वह नीचे झुका।
मुँह रखा और चाटने लगा।
अनाड़ी की तरह, लेकिन उत्साह से भरा।
बंसरी आँखें बंद करके सिसकार रही थी, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रही थी।
15 मिनट तक चाटने के बाद भी वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई थी।
वह तो सिर्फ़ गर्म हुई थी।
वह जानती थी – रोहन जैसे अनाड़ी के लिए उसकी चूत की गर्मी को झेलना, उसे पूरी तरह संतुष्ट करना लगभग असंभव था।
लेकिन रात अभी बहुत लंबी थी...
और बंसरी की छिपी हुई आग अभी सिर्फ़ चिंगारी थी।
(आपको यह अध्याय कैसा लग रहा है कमेंट करके बताएं)