वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure story

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
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Re: वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure st

Unread post by novel » 30 Oct 2015 08:09

उस रात, गंगा के जल में, खूब हिलोरें उठीं! किनारे तक नहीं बच पाये! मन में, एक अजीब सा अहसास था, एक अहसास! जो इतने बरसों तक तो कहीं नहीं था, कभी नहीं हुआ था! देह भी वही थी! लेकिन अब कुछ अलग सा ही लगता था! माला सुबह से ही कई बार उस भूदेव से मिलना है, मिलना है, यही चिल्ला रही थी! जब भी उसके करीब से गुजरती तो यही कहती!
और फिर दोपहर बाद, वे चली कुँए की तरफ! आज सामने ही नज़र थी उसकी! सामने, जहां से वो घुड़सवार आया करता था! घड़े में पानी भर, और फिर गिरा दिया कुँए में! कारण! अभी तक नहीं आया था वो घुड़सवार! माला सब देख रही थी, लेकिन बोली कुछ न, ये मात्र उस गंगा का अंतर्द्वंद था, इसीलिए नहीं उलझी उस गंगा से! कई बार पानी भरा, और कई बार गिरा दिया! पूरा घंटा बीत गया! लेकिन वो नहीं आया उस दिन! न जाने क्या बात हुई!
"अब चल, साँझ तक इंतज़ार करेगी क्या?" बोली माला!
सर उठाके देखा उसने, उसी रास्ते को! सुनसान पड़ा था! कोई नहीं आ रहा था! सुनसान! ज़मीन तप रही थी धूप से, और मरीचिका का नृत्य हो रहा था उस रास्ते पर! और कुछ नहीं!
"चल! अब चल, कोई काम पड़ गया होगा उसे!" बोली माला!
पानी भरा, अनमने मन से उसने! उठाया, और बिन कुछ कहे, चल पड़ी घर के लिए! रास्ते में, कई बार पीछे देखा! कोई नहीं था! बस सुनसान!
पहुँच गयीं घर! पानी रखा उसने! दीवार में बने आले में! और सीधा अपने कमरे में चली गयी! गुमसुम सी! जा लेटी बिस्तर पर! माला आई वहाँ!
"गंगा?" बोली वो!
बैठ गयी उधर ही!
"हूँ?" बोली गंगा!
"याद आ रही है उसकी?" पूछा उसने!
अब क्या बोले वो!! कैसे बताये कि याद तो छोटी सी वस्तु है!! छोटा सा शब्द!
"आज काम पड़ा होगा कोई उसे!" बोली माला,
कुछ न बोली! आँख बंद किये, लेटी रही!
"कल आ जाएगा! पूछ लेना, कल क्यों नहीं आये थे!" हंस के बोली गंगा!
तभी आहट हुई, कोई आ रहा था, माला उठ खड़ी हुई और चली बाहर, गंगा भी उठ गयी, कपड़े ठीक किये उसने! माँ आई थी, माँ ने कुछ बातें कीं उस से! घर के विषय में ही और ये भी बताया कि उसकी बुआ का बेटा आ रहा है, घर घूमने! उस बुआ के बेटे से बहुत प्रेम करती थी ये गंगा, किसी सगे भाई से भी ज़्यादा! गंगा खुश हो गयी! एक पल के लिए, वो घुड़सवार छिप गया था कहीं!
उस रात भी, सो न सकी वो गंगा! सारी रात, वही ख़याल! वही यादें! वही बातें! घर कर गया था वो सरकारी मुलाज़िम उसके दिल में कहीं!
अगले दिन,
गयीं वे दोनों पानी लेने! सामने देखा, कोई नहीं था! कोई नहीं आ रहा था! बुझ सा गया चेहरा! पसीने की बूँदें, भवों से होते हुए, उसकी खूबसूरत पलकों पर आ पड़तीं! गरम थी, लेकिन उसके बाद भी, आँखें इंतज़ार में थीं! उस घुड़सवार के! पानी भरती, और गिरा देती!
कुछ समय ऐसे ही बीता! पानी भरती और अपने पांवों में गिरा देती!
"अरे? देख?" बोली माला!
झट से! झट से चेहरा उठा कर देखा!
चला आ रहा था वो भूदेव! उसका घोड़ा, सर हिलाये चला आ रहा था! तूफ़ान सा उठने लगा बदन में! दिल धड़कने लगा! जिसका इंतज़ार था, वो आ रहा था! लेकिन डर! डर था मन में! बहुत बड़ा डर! डर और स्थिरता के बीच में झूल रही थी गंगा! और फिर घोड़े के खुरों की आवाज़ करीब आती गयी! और रुक गया घोड़ा! रुका, तो पानी पीने के लिए वो घोड़ा आगे आया! एक नांद बनी थी, मवेशियों को पानी पिलाने की! माला भरने लगी वो नांद! और घोड़ा, पीने लगा पानी!
"पानी" बोला वो भूदेव!
आँखें नहीं मिलायीं!
मिला ही न सकी!
और वो भूदेव, पानी पीने के साथ ही साथ, वो प्रेमरस भी पीता चला गया!! उसकी नज़रें, न हटी उस गंगा से! पानी पी लिया, तो हाथ पोंछे उसने!
पूछ गंगा!
पूछ!
कल क्यों नहीं आये थे?
क्यों? पूछ न गंगा!!
कैसे पूछे! शब्द ही नहीं निकल रहे थे मुंह से! होंठ, खुल ही नहीं रहे थे!
"कल नहीं आ पाया था मैं गंगा!" बोला वो!
कुछ न बोले! देखे भी नहीं!
"मुझे तेरी बहुत याद आई कल!" बोला वो!
याद तो गंगा को भी आई थी!!
"कल आई थी तू?" पूछा उसने!
कुछ न बोली वो!
"मेरा इंतज़ार किया था या नहीं?" पूछा उसने!
क्या बोले!! कैसे बताये!
"तेरी तू जाने गंगा! मैं प्रेम करने लगा हूँ तुझसे! सच्ची!" बोला वो!
जैसे ही 'प्रेम' बोला, आँखें मिंच गयी गंगा की!
"तेरे लिए आया हूँ गंगा, सुबह से निकला हूँ! बिन खाए पिए! तुझे देख लिया, अब भूख-प्यास नहीं!" बोला वो!
और गंगा!! गंगा शांत!! शांत! पत्थर सी!
"तू कुछ बोलती क्यों नहीं गंगा?" पूछा उसने!
नहीं बोली कुछ!
"बोल न?" बोला वो!
नहीं बोली!! होंठ नहीं खुले!
"देख, तू बोलेगी नहीं तो मैं कैसे जानूंगा, कि मैं तुझे तंग कर रहा हूँ या नहीं?" बोला वो!
कैसे बोले गंगा!! और तंग!!!
"देख, नहीं बोलेगी तो नहीं आऊंगा मैं!" बोला वो!
न बोली!
कुछ न बोली!
हाँ, आँखें ज़रूर मिंच गयीं इस बार!
"बोल न गंगा?" बोला वो!
नहीं बोल सकी! चाहते हुए भी, नहीं बोल सकी!
"मैं बहुत दूर से आता हूँ गंगा! सिर्फ तुझसे मिलने! और तू, तू बोलती नहीं कुछ भी?" बोला वो!
कुछ पल ऐसे ही बीते!
न बोली वो! वो हया क़ज़ा सी बन गयी!
"ठीक है, मत बोला! आऊंगा तो ज़रूर मैं! तुझे देखे बिना, चैन तो है नहीं! तुझे, चुपके चुपके देख लिया करूँगा! ठीक है गंगा! तेरी मर्ज़ी!" बोला वो!
घोड़े ने पानी पी लिया था!
"चल, पानी पिला, रात तक पहुंचूंगा अब वापिस" बोला वो!
गंगा ने, घड़ा आगे कर दिया!
भर दी ओख उसकी! वो पानी पीता रहा, बिन उसे देखे! तब, पहली बार गंगा ने देखा उसको! बांका था! जवान! चौड़ा चेहरा! रौबदार मूंछें! चौड़ा सीना! और मज़बूत भुजाएं! पाँव में, जूतियां पहने था! तावदार जूतियां!
और उसी पल!
उसी पल!
आँखें उठायीं उस भूदेव ने!
आँखें मिलीं उसकी गंगा से!
पहली बार!!!
पहली बार नज़र दो से चार हुईं!
और जैसे ही हुईं! घड़ा गिरते गिरते बचा उस गंगा का!! पकड़ी गयी थी! उसकी चोर-नज़र, पकड़ी गयी थी!
"ठीक है गंगा! चलता हूँ मैं अब!" बोला वो!
कसक सी पड़ी गंगा!!
हाथ पोंछे उसने!
"अब चलता हूँ, आ नहीं पाउँगा एक पखवाड़ा! मुझे दूर जाना है किसी काम से! तुझे देख लिया, तो चैन पड़ा! आऊंगा मैं, एक पखवाड़े के बाद!" कह कर, घोड़े पर चढ़ गया वो!
लगाई एड़ घोड़े को!
"अच्छा गंगा! चलता हूँ!" बोला वो!
और चल दिया! गंगा देखती रही! देखती रही उस घोड़े के खुरों से उठती उस मिट्टी को!
और वो!! भूदेव!
नहीं देखा उसने पीछे मुड़के! एक बार भी नहीं!!
चुप! गुमसुम!
माला ने झिंझोड़ा उसको!
आँखों में झाँका!!
आँखों में, हया की छाँव थी! गहरी छाँव!
"पंद्रह दिन!!" बोली माला!
उसको चिढ़ाते हुए!!!!

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Re: वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure st

Unread post by novel » 30 Oct 2015 08:10

"एक पखवाड़ा!" सुना तूने? बोली माला!
सुन्न पड़ गयी थी बेचारी गंगा तो! पास होता है, तो होंठ नहीं खुलते, दूर होता है तो दिल नहीं खुलता! वो तो बोलता रहा है कि कुछ बोल गंगा, कुछ बोल! नहीं बोल पाती! ये कैसी अजीब सा अहसास है! खुद अपनी होकर भी खुद अपनी नहीं! परायी सी! बेग़ानी सी! ये क्या है??
"अब क्या करेगी गंगा?? कम से कम बात तो कर लेती!" कटाक्ष सा मारा माला ने!
गंगा चुप! उसके कानों में तो एक पखवाड़ा शब्द ही गूँज रहा था उस भूदेव का! क्या बोले!
"कुछ बोल तो सही?" बोली माला!
चुप! नहीं बोली कुछ!
"लगता है वो सरकारी मुलाज़िम आवाज़ भी ले गया साथ अपने तेरी!" ताली पीटते हुए बोली माला! मज़ाक उड़ाते हुए! और तब अपने होश में आई गंगा!
"चल, घर चल अब" बोली वो!
"हाँ, अब घर ही जाना है, तू तो आएगी नहीं अब पंद्रह दिनों तक पानी भरने!" फिर से कटाक्ष!!
घूर के देखा गंगा ने उसको!
"उसे घूर लिया होता तो ये हाल न होते!" बोली माला!
गंगा भी हंस पड़ी!!
"चल अब!!" बोली वो!
"चल" बोली माला,
और चल पड़े वापिस दोनों! पीछे मुड़के देखा दोनों ने! कोई आ रहा था, दो घुड़सवार! वे रुक गयीं! जब पास से गुजरे तो, हलकारे थे वो!
"काश कि वो होता!" बोली माला!
"धत्त! अब चुप हो जा! बस!" बोली गंगा!
अब चुपचाप चलते चलते, आ पहुंची घर अपने! घर आते ही, पानी रखा आले में, और फिर अपने कमरे में चली गयी सीधी! जा लेटी! माला भी आ गयी वहां!
"उफ़! एक पखवाड़ा!" बोली माला! चिढ़ाते हुए उसको!
हिलाये गंगा को! खींचे उसके हाथ-पाँव! और गंगा! छिटके उसके हाथ!
"मत कर माला!" बोली वो!
"ठीक है! तेरी मर्ज़ी!" बोली माला और चली गयी बाहर! अपना काम देखने!
चार दिन बीते! और चार दिन!
इन आठ दिनों में, पानी लाना नहीं छोड़ा उसने! आस थी उसको! कि कही आ ही जाए, वो भूदेव! वो आठ दिन तो, आठ बरस बन गुजरे थे! बार बार रात ताकना, आँखों पर, धूप से बचने के लिए, हाथ रख कर, रास्ते को खंगालना! दिन में, अपने से जुदा! रात में अपने में क़ैद! तड़प! बिरहा सुना ही था, भोगा नहीं था, अब समझ आने लगा था उसको! और उधर माला, माला न छोड़े उसे! चिंगारी भड़काए! वो जमना! जमना भी चिढ़ाये!
उनसे तो बच जाती वो! लेकिन अपने से? अपने से झूठ कैसे बोले? कैसे बोले कि प्रेम नहीं हुआ है उसे! क्यों दिन और रात बिस्तर पर लेटे, सलवटें सुलझाती है वो, चादर की! क्यों!!! क्यों अपने आपको, दर्पण में देखा, आँखें झुक जाती हैं! खुद से कैसे झूठ बोले! कैसे!
मित्रगण!
शेष बचे दिन भी करवट लग गए! लेकिन करवटें बहुत बदलीं उसने! ये प्रेम अगन है, एक बार सिगर जाए तो बुझने का नाम नहीं लेती! एक ही तरह से बुझ सकती है ये! कि खुद जल जाओ इसमें! बस, और किसी भी तरह, नहीं बुझ सकती वो! तो गंगा, जल रही थी! उसी प्रेम अगन में!
और फिर सोलहवां दिन आया! आज मन में फूल खिले थे! उस प्रेम की हवा ने, शीतल हवा दी थी फूलों को! आज का दिन, और दिनों से कहीं अलग था! कहीं अलग! आज तो सुबह से ही, इंतज़ार था किसी का! आज का स्नान भी ख़ास था! वस्त्र भी ख़ास और चाल-ढाल भी ख़ास!
फिर हुई दोपहर!!
अब अब लगी, लगी!! प्रेम की लगी! इस लगी का कोई नाम नहीं! ये इंतज़ार से अलग है, चाह से अलग है, इच्छा से अलग है! जिसको ये लगी लग जाए, तो फिर कहीं और नहीं लग सकता! यही है वो लगी! अब गंगा को लगी थी ये लगी!!
पहुँच गयीं कुँए पर!! और गंगा ने रास्ता तकना शुरू किया फिर! आज तो नज़र हटाई ही नहीं उसने! उस तेज धूप में, चलती गरम लू, उसकी साँसों से गरम न थीं आज! नज़रें बिछा दीं! वहीँ देखती रही! आँखों पर हाथ धरे!!
और फिर सामने कोई नज़र आया! एक छोटा सा काला बिंदु! कीकर के पेड़ों के बीच आते उस रास्ते के बीच, कोई चला आ रहा था! ये मरीचिका नहीं थी! कोई आ रहा था! करीब, और करीब! गंगा कुँए के पास आ खड़ी हुई, पीठ पीछे किये! साँसें आज धौंकनी से तेज थीं! धड़कन, आज बहुत तेज, बहुत तेज थीं! कान, आवाज़ पर लगे थे! आँखें, देख तो नीचे रही थीं, लेकिन ध्वनि के साथ बंध गयी थीं वो! खुरों की आवाज़ आई! धीरे हुई, और धीरे! और फिर रुक गयीं! घोड़े से उतरा कोई! और घोड़ा, पानी पीने आगे आया! घोड़े के लिए, पानी निकालना शुरू किया अब माला ने!
"पानी!" बोला वो!
गंगा के बदन में चिंगारी सी दौड़ गयी! कितनी मधुर आवाज़ थी! लेकिन रौबदार! गंगा ने घड़ा उठाया, और बढ़ा दिया उसकी तरफ! उसने हाथों से ओख बनाई, और पानी पीने लगा, लगातार देखता हुए उसे! लेकिन गंगा के नेत्र! नेत्र नहीं उठे! कहीं पकड़े न जाएँ इसका डर था!!
पानी पी लिया उसने! हाथ पोंछे!
"गंगा!" बोला वो!
कुछ न बोली!
सिहर के रह गयी!
ये है क्या? सामने हो, तो होंठ सिल जाएँ, न हो तो अपने से जुदा? ये है क्या??
"गंगा?" बोला वो!
वो कुछ न बोली!
"तुझे बहुत याद किया मैंने!" बोला वो!
गंगा! अंदर ही अंदर, अपना नाम सुन, कांपे! प्रेम की कंपकंपी!!
"तुझे याद आई मेरी?" पूछा उसने!
याद?
कब नहीं आई!!!
लेकिन बताये कैसे???
कैसे बताये?
"माला?" बोला वो!
"हाँ?" बोली माला!
"इसे, मेरी याद आई?" पूछा उसने!
"हाँ, बहुत याद आई!" बोल दिया माला ने!
और गंगा! पानी पानी!!
"गंगा! अपने मुंह से कह दे, प्राण तेरे नाम कर दूंगा मैं गंगा!" बोला वो!
अपने मुंह से!!
कैसे?
कैसे भूदेव कैसे!!
"गंगा! मुझसे बात कर?" बोला वो!
गंगा चुप! हाथ लगाओ, तो ढह जाए रेत की तरह!
"गंगा? मुझसे बात कर, देख, मैं सुबह से चला हूँ तेरे लिए!" बोला वो!
गंगा चुप!
कुछ न बोले!!
शब्द ही न मिलें!
होंठ ही न खुलें!
"गंगा! मैं तुझे प्रेम करता हूँ, ये मेरी गलती है? नहीं न? अगर तू कह दे, कि नहीं आओ यहां, तो नहीं आऊंगा, ये मेरा भाग्य ही सही!" बोला वो!
ये क्या कह दिया भूदेव?
क्या कह दिया?
"गंगा?" बोला वो!
आगे बढ़ा थोड़ा सा! गंगा जस की तस!
आगे आये और, और!!
हाथ पकड़ लिया गंगा का! घड़ा गिरता, तो अपने एक हाथ से घड़ा पकड़ लिया था उसने! हाथ से पकड़ा, तो गंगा, जैसे बहने लगी! किनारों को तोड़! उस पकड़ ने, देह में ऐसी अगन लगाई कि खुद झुलस उठी! बदन की जैसे सारी जान, उस पकड़ में आ गयी थी! क्या पकड़ थी! उसकी पूरी कलाई, उसकी मुट्ठी में थी!!
गंगा हाथ छुड़ाए!
कोशिश करे!
लेकिन वो! न छोड़े! न छोड़े!
"गंगा! माफ़ करना, लेकिन मैं रोक नहीं सका अपने आप को!" कहते हुए, हाथ छोड़ दिया उसका!
कलाई पर, नील पड़ गए! उंगलियां छप गयीं थी उसकी!
"गंगा?" बोला वो!
अपन हाथ पीछे कर, चुप खड़ी रही!
"सुन गंगा?" बोला वो!
न सुना!
"ये ले!" बोला वो! अपनी जेब से कुछ निकाल कर!
कुछ! एक मोतियों की माला थी उसके हाथ में!
"ले गंगा?" बोला वो!
और गंगा!!

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Re: वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure st

Unread post by novel » 30 Oct 2015 08:10

और गंगा! गंगा पाषाणवत खड़ी रही! भाव थे, लेकिन बदन में! दिल में! क्या करे! कैसे ले ले!! जड़! जड़ थी गंगा! गंगा में जैसे ठहराव आ गया था! शून्यवत हो चली थी गंगा!
"ले? ले न गंगा?" बोला वो!
गंगा के न हाथ हिले न पाँव! न आँखें ही हिलीं! पुतलियाँ जैसे स्थिर थीं! जैसे पाषाण की प्रतिमा की आँखें!
"गंगा! मैं जहाँ गया था, वहाँ हाट थी, न अपने लिए खरीदा कुछ न किसी और के लिए! बस तेरे लिए, मेरी गंगा के गले में सजेगी, तो चार चाँद लगेगी! बस खरीद लिया! ले! ले गंगा!!" बोला वो!
"गंगा! ले ले!" बोला वो!
कैसे ले ले गंगा! शब्द तो फूट नहीं रहे थे!
"गंगा! देख, मैं प्रेम करता हूँ तुझसे, बहुत प्रेम! रह नहीं सकता तेरे बिना! ले ले गंगा! ले ले!" फिर से बोला वो!
और सच में! वो मोतियों की माला, गले में सजती गंगा के, तो चार चाँद लगाती! गोरे रंग पर, वो माला, मोतियों की!
"गंगा! ले ले!" बोला वो!
न ली गंगा ने!
और उस, भूदेव केलरजते हाथों से, माला गिर गयी! नीचे पानी में! पानी में गिरी, तो मोती गंदे हुए, समाने लगे कीचड़ में!
न जाने क्या हुआ! जैसे, अपने दिल के टुकड़े को उठाया उस गंगा ने! उठाया, और भींच लिया अपने हाथ में!
"गंगा!! मेरी गंगा!" कह दिया उसने!
और गंगा! अब किनारे कब तोड़ बैठे पता नहीं!!
"गंगा, सरकारी मुलाज़िम हूँ कभी आना हुआ, कभी नहीं, लेकिन, तुझे दिल में बसाया है, मेरी ही रहना! हमेशा!" वो बोला!
पता नहीं! पता नहीं क्या क्या अनाप-शनाप बके जा रहा था वो! गंगा नहीं समझ पा रही थी!
"आऊंगा! गंगा! आऊंगा मैं दुबारा! अब चलता हूँ! ये माला, पहन लेना! मेरी गंगा के लिए है!" बोला वो!
घोडा पकड़ा!
जीन जमाई!
और बैठ गया!
"गंगा! फिर आऊंगा मैं!" बोला वो!
लगाई एड़! और ये जा और वो जा!
गंगा देख भी न सकी!
और जब देखा, सर उठाकर, तो वो, भूदेव नहीं था वहाँ!! हवा से बातें कर, जा चुका था!
कुछ पल ऐसे ही बीते!
खामोशी के!
मदहोशी के!
"सच में, बहुत प्रेम करता है तुझसे!" बोली माला!
गंगा की तन्द्रा टूटी!!
"सैंकड़ों की माला दे गया तुझे! दिखा?" बोली माला!
न दिखाई!
कैसे दिखाती!
कैसे!!
उसकी थी वो! कोई,
लाया था उसके लिए हाट से!
कैसे दिखाती!!
हाथों में, भींच ली उसने वो माला!
"चल! घर चल!" बोली माला!
कठपुतली सी, वो गंगा! उस माला को लिए चल पड़ी घर!
घर पहुंची!
कमरा किया बंद!
और हाथ खोला! वो माला!!
उस भूदेव की माला!!
सफ़ेद, मोतियों की माला!
लगा ली गले से! क्या सुंदर दिखे!!
पहन ली! पहन ली उसने!!
सच में, चार चाँद नहीं, आठ चाँद निखर उठे!!
जैसे वो माला उसके लिए ही बनी हो! क्या खूब सजी!!
तभी दस्तक हुई दरवाज़े पर!!!
खोला दरवाज़ा! माला थी सामने! नज़र पड़ी माला पर!
"उफ़! जैसे तेरे लिए ही बनी हो गंगा!" बोली माला!
गंगा!
शर्मा गयी!!
माला को हाथ लागए! छिपाए!
लेकिन,
न बन पड़े!!!
माला, अपना नूर, उँगलियों के बीच से झलका दे!
"तू कह क्यों नहीं देती?" बोली माला!
"क्या?" बोली गंगा!
"कि तू भी प्रेम करती है उस से?" माला बोली!
"मैं कैसे कहूँ, होंठ सिल जाते हैं" बोली गंगा!
"बोलना तो पड़ेगा" बोली माला!
"कैसे कहूँ माला?" बोली गंगा!
"मुंह से!" बोली माला!
"मुझसे नहीं बनता!" बोली वो!
"कहना तो पड़ेगा!" बोली माला!
"कैसे कह दूँ?" बोली गंगा!
"जैसे ये माला पहनी!" बोली वो!
"मेरे बस में नहीं!" बोली वो!
"तो तड़पती रह!" माला बोली!
तड़पन!
आह! तड़पन!!
कैसे अजीब है ये तड़पन!!
न कहे कुछ बने! न सहे कुछ बने!
"कल कह देंना उस से!" बोली माला!
कल!
आएगा वो?
कल आएगा?
हाँ!
कोशिश करुँगी!
पक्का करुँगी!
कह दिया गंगा ने!
और सारी रात, उस माला की अगन में, दहन होती रही वो गंगा!!
अगला दिन!
वो कुआं!
वो नाल का कुआँ!
वो रास्ता!
वो निगाहें!
सब वही था!!
और फिर एक बिंदु!
काला बिंदु!
आ रहा था कोई!!
वही! वही भूदेव!
खुरों की आवाज़ आई!
और आवाज़ बंद!
कोई उतरा!
"पानी, गंगा!" बोला वो!
गंगा के हाथ, अपने आप उठ गए! ताज़ा, ठंडा पानी!
पिया उसने!
"गंगा! तूने माला पहनी, मैं तेरा ऋणी हुआ! मेरी गंगा!" बोला वो!
मेरी गंगा!
लहर उठ गयी! तेज लहर!!!
"गंगा! आज मुझसे बात कर! पता नही, फिर कभी आऊं या नहीं!" बोला वो!
आऊं या नहीं?
मतलब?
"हाँ गंगा! कल, जाना है बाहर, मैं सेना का कारिंदा हूँ, नहीं पता, कब लौटूं! आऊं या नहीं!" बोला वो!
गंगा, काँप उठी!
नहीं! ऐसा नहीं हो सकता!! कभी नहीं!
"गंगा! कल जाना है, बहुत दूर, वापिस आया तो दो महीने लग जाएंगे! ज़िंदा लौटूं या मुर्दा, पता नहीं!" बोला वो!
गंगा क्या कहे?
जान पांवों में आ गयी उसके!
"गंगा?" बोला वो!
"हाँ?" बोली गंगा!
शब्द कैसे निकले! पता नहीं! जुबां कैसे खुली! पता नहीं!
"गंगा!! मेरी गंगा!!" बोला वो!
और पकड़ लिया उसका हाथ!!
"गंगा! मुझे प्रेम करती है न तू?" पूछा उसने!
"हाँ!" बोल गयी गंगा!
न जाने, कहाँ से साहस आया! गंगा, बहने लगी थी अब!
ठहराव, समाप्त हो चुका था!
"मेरी गंगा!" बोला वो!
और भर लिया गंगा को अपने सीने में!!
भरभरा गयी गंगा!!!
शायद, अचेत हो जाती!
लेकिन उस मज़बूत कद-काठी वाले ने, संभाल ली थी, वो, गंगा!
क्रमशः

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