बंसरी का जीवन 1

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Ask143
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बंसरी का जीवन 1

Unread post by Ask143 » 21 Feb 2026 18:48

अध्याय 1: अप्सरा की छिपी आग – भव्य विवाह और सुहागरात की पहली चिंगारी

3 मार्च, शुक्रवार की रात।
रात के ठीक 11:40 बजे।
शहर के सबसे शानदार पाँच सितारा होटल "ग्रैंड पैलेस" के विशाल ग्रैंड बॉलरूम में शादी का रिसेप्शन अपने चरम पर था।

हॉल की ऊँची छत से लटकते क्रिस्टल झूमरों की रोशनी हीरे की तरह चमक रही थी। हर झूमर में हजारों छोटे-छोटे क्रिस्टल टुकड़े एक-दूसरे से टकराकर इंद्रधनुषी रंग बिखेर रहे थे। दीवारें मखमली लाल और सुनहरी कपड़ों से सजी हुई थीं, जिन पर हाथ से कढ़ी हुई मोतियों की मालाएँ लहरा रही थीं। फर्श पर सफेद और गुलाबी गुलाबों की पंखुड़ियाँ बिछी हुई थीं, हर कदम पर महक उठ रही थी। हवा में चंदन, गुलाब और महँगे इत्र की मीठी-तीखी खुशबू घुली हुई थी। दूर कोने में एक लाइव बैंड धीमे-धीमे शहनाई और सितार की धुन बजा रहा था, जिसकी लय हर किसी के सीने में उतर रही थी।

लगभग सभी मेहमान विदा हो चुके थे। बचे हुए थे सिर्फ़ कुछ खास रिश्तेदार, करीबी दोस्त और परिवार के लोग। मंडप अब भी भव्य था – चारों तरफ़ गेंदे, चमेली और राजनिगंधा के फूलों के तोरण, बीच में स्वर्णिम कलश, और ऊपर से गिरता हुआ फूलों का झरना। हल्की-हल्की धूप की रोशनी मंडप को स्वर्गीय बना रही थी।

ठीक उसी समय दूल्हा और दुल्हन सात फेरे पूरे कर रहे थे।

दूल्हा रोहन कसाना – उम्र 33 साल। लंबा कद, चौड़े कंधे, गोरा रंग, नुकीली नाक और गहरी आँखें। सिर पर रेशमी पगड़ी, जिस पर मोतियों का कलगी जड़ा था, और शरीर पर क्रीम कलर की भारी ज़रीदार शेरवानी, जिसमें सोने के बटन चमक रहे थे। वह चेन्नई में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन पूरा परिवार नॉर्थ इंडियन कसाना खानदान का था। उसकी चाल में आत्मविश्वास था, लेकिन आज उसकी आँखों में सिर्फ़ एक ही चीज़ थी – बंसरी।

और दुल्हन... बंसरी नागर।

वह किसी स्वर्ग की अप्सरा से कम नहीं थी। उसका बदन दूध की तरह शुद्ध गोरा, इतना चिकना कि रोशनी उस पर फिसल जाती थी। कद सिर्फ़ 5 फीट 3 इंच, वजन महज़ 52 किलोग्राम, लेकिन उसका फिगर... 32-24-35।
32 इंच के भरे-भरे, उभरे हुए स्तन, जो चुस्त ब्लाउज़ में भी हिलते-डुलते थे।
24 इंच की पतली कमर, बिल्कुल सुराही जैसी, जिसे कोई भी हाथ दो हिस्सों में पकड़ सकता था।
35 इंच के गोल, मोटे, पीछे की तरफ़ उभरे हुए नितंब, जो लहराते हुए चलती थी तो हर आँख ठहर जाती थी।

उसके बाल घने, गहरे काले, सीधे उसके नितंबों तक लहराते हुए। आँखें काली, गहरी, जैसे काजल की दो झीलें। होंठ गुलाबी, नाक नुकीली, और चेहरा इतना निष्पाप कि देखने वाला पल भर के लिए भूल जाता था कि उसके अंदर क्या-क्या छिपा है।

उसके मोहल्ले में तो उसकी खूबसूरती की चर्चा हर घर में थी। लड़के सड़क पर खड़े होकर सीटी बजाते, "भाई साहब, ये तो माल है... एक बार देख लो तो रात भर नींद नहीं आएगी!"
बड़े-बड़े आदमी, जो उम्र में उसके पिता के बराबर थे, चुपके से उसकी ओर ताकते और फुसफुसाते, "क्या चूत है यार... देखने में तो संस्कारी लगती है, लेकिन अंदर से तो आग है।"
शहर के कॉलेज लड़के उसके नाम पर झगड़े करते, फेसबुक पर उसके फोटो चोरी-छिपे सेव करते। कोई कहता, "बंसरी को देखकर तो लंड खड़ा हो जाता है भाई... 25 साल की है, लेकिन 18 की लगती है।"
दुकानदार, रिक्शेवाले, ऑफिस वाले – हर कोई एक बार उसे देख लेने के बाद रात को अपनी बीवी को कल्पना करके चोदता। लेकिन कोई नहीं जानता था कि बंसरी ने 25 साल की उम्र में ही 200 से ज़्यादा मर्दों के लंड अपनी चूत और गांड में झेल लिए हैं। हर उम्र के – 18 के लड़के से लेकर 65 के बूढ़े तक। हर तरह के – मोटे, पतले, लंबे, छोटे।

नाम में ही छुपा था उसका स्वभाव – बंसरी। बजाना उसे बहुत पसंद था... और वो न सिर्फ़ बांसुरी, बल्कि हर उस चीज़ को बजाना जानती थी जो उसके अंदर घुस सकती थी।

जब पहली बार उसकी भाभी ने उसके लिए एक लंबे-मोटे लंड का इंतज़ाम किया था, उसी दिन से उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तब से लेकर आज तक उसने संभोग के हर सुख को चख लिया था – गैंगबैंग, थ्रीसम, आउटडोर, होटल, कार, यहाँ तक कि ट्रेन की बर्थ पर भी।

लेकिन बाहर से? एकदम संस्कारी, शर्मीली, घर की इज्जत वाली कन्या।

फेरे खत्म होते ही मंत्रोच्चार के साथ "सप्तपदी समाप्त" की घोषणा हुई। शहनाई फूट पड़ी। लोग तालियाँ बजाने लगे।

विदाई का समय आया।
बंसरी अपनी भाभी की गोद में सिर रखकर रोई। आँसू असली थे, लेकिन उन आँसुओं के पीछे छिपी मुस्कान किसी को नहीं दिखी। वह जानती थी – अब नई ज़िंदगी शुरू होने वाली है।

ससुराल उसके शहर से 100 किलोमीटर दूर दूसरे शहर में था। कारों का काफ़िला रात में डेढ़ घंटे तक चलता रहा। सुबह के 6 बजे जब वे पहुँचे थे, पड़ोसियों ने भी उसका स्वागत किया था ।

बंसरी के ससुराल में ज़्यादा लोग नहीं थे – सास- ससुर, जेठ-जेठानी, उनके 10 साल का बेटा और 8 साल की बेटी। नंद की शादी चार साल पहले हो चुकी थी, उसके एक साल की प्यारी सी बेटी भी थी। सबने नई बहू का ढोल-नगाड़े के साथ स्वागत किया। आरती उतारी गई, पैरों में दूध-दही से छिड़काव हुआ। बंसरी मुस्कुराते हुए सबके पैर छू रही थी।

पूरे दिन घर में कार्यक्रम चले – पूजा, हवन, गिफ्ट खोलना।
रात के 11 बजे तक सब थककर सो गए।

रोहन का पुराना कमरा शादी के लिए खास तौर पर सजाया गया था।
कमरे में सफेद रोशनी, बेड पर लाल चादर, चारों तरफ़ गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी हुईं। हवा में अगरबत्ती और महँगे इत्र की खुशबू। ए सी की ठंडी हवा में भी गर्मी थी।

बंसरी पलंग पर बैठी हुई थी।
लाल साड़ी में, ब्लाउज़ का पल्लू थोड़ा सरका हुआ, माथे पर सिंदूर, मंगलसूत्र चमक रहा था। बाल खुले, आँखों में काजल, होंठों पर हल्का लिपस्टिक। वह इंतज़ार कर रही थी।

दरवाज़ा खुला। रोहन अंदर आया।
उसने दरवाज़ा बंद किया, चिटकनी लगाई और पलंग के पास आकर बैठ गया।

रोहन (धीमी, काँपती आवाज़ में): "बंसरी... तुम इस लाल साड़ी में... सच में स्वर्ग की अप्सरा लग रही हो। इतनी खूबसूरत... कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि तुम अब मेरी हो।"

बंसरी (मुस्कुराते हुए, आँखों में शरारत): "साड़ी में सुंदर लग रही हूँ... या बिना साड़ी के इमेजिन करके कह रहे हो?"

यह कहते हुए वह आगे बढ़ी। दोनों हाथों से रोहन के चेहरे को पकड़ा और अपने गुलाबी होंठ उसके होंठों पर रख दिए।
यह उनका दूसरा किस था।

पहला किस तभी हुआ था जब रोहन उसे देखने घर आया था। उस दिन भी बंसरी ने ही पहल की थी। रोहन के लिए वो पहला किस था किसी लड़की का। वह पागल हो गया था। उसी रात उसने फैसला कर लिया था – यही लड़की चाहिए।

अब किस गहरा होता गया।
जीभें एक-दूसरे में उलझ गईं। बंसरी की जीभ रोहन की जीभ को चाट रही थी, चूस रही थी, उसके मुँह के हर कोने को छू रही थी। रोहन के हाथ उसकी पीठ पर फिर रहे थे।

कुछ ही देर में दोनों के हाथों ने एक-दूसरे के कपड़े उतारने शुरू कर दिए।
साड़ी की पिन खुली, ब्लाउज़ के हुक टूटे, पेटीकोट की नाड़ी खुली। रोहन की शेरवानी, कुर्ता, बनियान – सब फर्श पर गिर गए।
बस रोहन का काला अंडरवियर बचा था।

बंसरी पूरी तरह नंगी हो चुकी थी।
दूधिया गोरा बदन, भरे हुए 32 इंच के स्तन हवा में लहरा रहे थे। गुलाबी निप्पल्स खड़े होकर रोहन को ललचा रहे थे। पतली कमर, गोल नाभि, और नीचे साफ़ चूत – बिल्कुल बाल रहित, गुलाबी।

रोहन अभी भी किस में खोया था। जब उसकी साँस फूलने लगी तो उसने मुँह हटाने की कोशिश की। लेकिन बंसरी ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और और गहरा किस किया। उसकी जीभ रोहन की जीभ को लपेटे हुए थी, उसके मुँह के अंदर घुस-घुसकर चाट रही थी।

आखिरकार रोहन ने हाँफते हुए खुद को अलग किया।
और जैसे ही उसकी नज़र बंसरी के नंगे शरीर पर पड़ी – वह पागल हो गया।

"ओह माय गॉड... बंसरी..."

बंसरी ने मुस्कुराते हुए एक स्तन हाथ में उठाया, निप्पल को उँगलियों से दबाया और रोहन के मुँह के पास ले गई।

बंसरी (फुसफुसाते हुए, कामुक स्वर में): "चूसो न... अपनी बीवी के स्तन चूसो... जितना मन करे..."

रोहन ने जैसे भूखा शेर हो, दोनों हाथों से उसके स्तनों को पकड़ा और निप्पल मुँह में ले लिया। चूसने लगा, काटने लगा, चाटने लगा। बंसरी की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगीं – "आह्ह्ह... हाँ... और जोर से... काटो... चूसो..."

दोनों स्तनों को अच्छी तरह चूसने के बाद रोहन थक गया।

बंसरी ने उसके गले पर गहरी चुम्मा लिया, जीभ से चाटा और उसके कान में फुसफुसाई:

"अब तुम्हें मेरी चूत को शांत करना होगा... बहुत जल रही है... देखो न..."

यह कहते हुए वह पलंग पर लेट गई।
दोनों टाँगें उठाईं... और कंधों के पीछे ले गईं।
पूरी चूत और गांड का छेद खुलकर सामने आ गया।

यह पोज़िशन किसी आम लड़की के लिए असंभव थी, लेकिन बंसरी के लिए? यह रोज़मर्रा की बात थी। सालों के अभ्यास, योग और अनगिनत चुदाइयों ने उसे इतना लचीला बना दिया था।

रोहन की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसे बंसरी की गुलाबी चूत साफ़ दिख रही थी – भीगी हुई, चमक रही थी। ऊपर छोटा-सा क्लिटोरिस खड़ा था। नीचे टाइट गांड का छेद भी साफ़ नज़र आ रहा था।

यह पहली बार था जब रोहन ने इतने करीब से, इतनी खुलकर चूत और गांड देखी थी। उसने अभी तक यह सब पॉर्न में ही देखा था।

बिना देर किए वह नीचे झुका।
मुँह रखा और चाटने लगा।
अनाड़ी की तरह, लेकिन उत्साह से भरा।

बंसरी आँखें बंद करके सिसकार रही थी, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रही थी।
15 मिनट तक चाटने के बाद भी वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई थी।
वह तो सिर्फ़ गर्म हुई थी।


वह जानती थी – रोहन जैसे अनाड़ी के लिए उसकी चूत की गर्मी को झेलना, उसे पूरी तरह संतुष्ट करना लगभग असंभव था।

लेकिन रात अभी बहुत लंबी थी...
और बंसरी की छिपी हुई आग अभी सिर्फ़ चिंगारी थी।

(आपको यह अध्याय कैसा लग रहा है कमेंट करके बताएं)

Ask143
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बंसरी का जीवन 2

Unread post by Ask143 » 21 Feb 2026 22:06

अध्याय 2: छिपी हुई ज्वाला की पहली लपट

कमरे की सफेद रोशनी अब और भी नशीली हो चुकी थी। लाल साटन चादर पर सफेद और गहरे लाल गुलाबों की पंखुड़ियाँ इस तरह बिखरी हुई थीं कि लग रहा था कोई स्वर्गीय फूलों का बिस्तर हो।

बंसरी धीरे-धीरे पलंग से नीचे उतरी।
उसका 5 फीट 3 इंच का गोरा, दूधिया बदन था। 32 इंच के भरे-भरे, भारी स्तन हर साँस के साथ हल्के-हल्के लहरा रहे थे, गुलाबी निप्पल्स पूरी तरह खड़े और सख्त हो चुके थे। 24 इंच की पतली कमर पर पसीने की पतली चमकती लकीर बह रही थी। 35 इंच के गोल, मोटे, लहराते नितंब पीछे की तरफ़ इतने उभरे हुए थे कि चलते वक्त दोनों तरफ़ हिल रहे थे। उसके लंबे, घने, गहरे काले बाल नितंबों तक लहराते हुए उसकी पीठ को छू रहे थे। चूत अभी भी रोहन की लार और अपनी चिपचिपी रस से चमक रही थी – गुलाबी, थोड़ी सूजी हुई, पूरी तरह खुली।

रोहन अभी भी घुटनों के बल फर्श पर बैठा था। उसके होंठ बंसरी की चूत की मीठी-नमकीन खुशबू से तर थे, आँखें अभी भी मदहोश।

बंसरी ने मुस्कुराते हुए दो कदम आगे बढ़े। उसके स्तन हिलते हुए रोहन की आँखों के सामने आए। उसने दोनों नरम, गरम हाथ रोहन की चौड़ी छाती पर रखे, उँगलियों से हल्का दबाव दिया और बहुत प्यार से, लेकिन दृढ़ता के साथ धक्का दिया।

रोहन का शरीर पीछे की तरफ़ सरक गया। वह पीठ के बल पलंग पर लेट गया। सिर तकिए पर आराम से, दोनों पैर पलंग के किनारे से नीचे लटक रहे थे – घुटने मुड़े हुए, पैरों की उँगलियाँ फर्श को हल्का-हल्का छू रही थीं। उसका पूरा नंगा शरीर अब बंसरी के सामने पूरी तरह फैला हुआ था।

बंसरी धीरे से झुकी।
उसके बाल दोनों तरफ़ से लहराते हुए रोहन की जाँघों पर गिर गए। उसने दोनों हाथ रोहन की कमर के ठीक दोनों ओर ले गए, उँगलियाँ काले अंडरवियर की इलास्टिक में फँसाईं और एक ही झटके में नीचे खींच दिया।

रोहन का लंड बाहर छलाँग लगाकर निकल आया।

5 इंच लंबा, पतला, हल्का साँवला, सुपाड़ा छोटा-सा गुलाबी, ऊपर की खाल अभी भी आधी ढकी हुई, जड़ पर घने काले बाल और नीचे दो छोटी-छोटी गेंदें लटक रही थीं।

बंसरी की आँखें पल भर के लिए पूरी तरह फटी रह गईं। उसका चेहरा भावहीन हो गया।

रोहन ने उसका चेहरा देखा और प्यार से, थोड़ी शर्म के साथ मुस्कुराते हुए बोला,
“डार्लिंग... मेरी जान... डरो मत ना... यह तो अब तुम्हारा ही है... तुम्हारे पति का... बड़ा सा... लेकिन दिल से पूरा तुम्हारा... तुम्हें देखकर तो यह भी खुश हो गया है... देखो ना... कितना खड़ा है तुम्हारे लिए...”

बंसरी ने मन ही मन एक गहरी साँस ली।
रोहन समझ रहा था कि वह लंड के साइज़ से डर गई है। लेकिन असली आश्चर्य कुछ और था।

उसके दिमाग में तूफ़ान उठ गया।
“मेरा पति... 33 साल का... इतना सुंदर... इतना पढ़ा-लिखा... कम से कम 6.5-7 इंच तो होना चाहिए था... मोटा... भरावदार... जो मेरी चूत को एक झटके में फाड़ दे... मेरी दीवारों को खुरचे... लेकिन यह... यह तो सिर्फ़ 5 इंच का पतला सा खिलौना है... मेरी चूत तो इससे भर भी नहीं पाएगी...”

फिर फ्लैशबैक आ गया।

MBA के दो साल...
जब वह अपनी दो अमीर अयाश सहेलियों के साथ प्रॉस्टिट्यूशन का धंधा करती थी।
हर हफ्ते अलग-अलग पाँच-सितारा होटल, अलग-अलग शहर, अलग-अलग क्लाइंट।
ज्यादातर क्लाइंट्स के लंड छोटे ही होते थे – 4 इंच, 4.5 इंच... कभी-कभी 5 इंच। उन्हीं से उसने लाखों कमाए थे। लेकिन महीने में एक-दो बार... असली माल नसीब होता था।

और सबसे यादगार – सिर्फ़ एक महीने पहले।
उसकी दोनों अयाश सहेलियों ने उसके लिए सरप्राइज़ बैचलर पार्टी दी थी।
एक प्राइवेट विला में पूरा हफ्ता।
प्रतिदिन पाँच अफ्रीकी महाद्वीप के काले, ऊँचे, मसल्ड मर्द।
दिन में दो... रात में तीन।
उनके लंड... 10 इंच से भी लंबे... मोटे... काले... नसों से भरे... सिर जैसे मुक्का।
आखिरी दिन दोपहर में दो अफ्रीकी एक साथ।
एक ने उसकी चूत में पूरा 11 इंच घुसेड़ दिया, दूसरे ने गांड में।
फिर दोनों ने मिलकर उसकी चूत में अपने दोनों लंड एक साथ ठूँस दिए।
बंसरी चीखी थी... रोई थी... लगा था आज मर जाएगी।
दर्द इतना था कि आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
लेकिन जब दर्द धीरे-धीरे कम हुआ... तो जो सुख मिला... वह जिंदगी का सबसे बड़ा, सबसे गहरा, सबसे नशीला सुख था।
उसके बाद उसकी चूत और गांड दोनों थोड़ी ढीली हो गई थीं... लेकिन अभी भी इतनी टाइट कि छोटा लंड अंदर घुसते ही “कुछ नहीं” जैसा लगता था।

बंसरी ने मन ही मन सोचा – “कोई बात नहीं... आज मैं इस अनाड़ी को इतना सुख दूँगी कि यह कभी भूल नहीं पाएगा... मैं इस छोटे लंड को भी राजा बना दूँगी...”

उसने अपनी नाटकीय हैरानी को तुरंत छुपाया और बहुत प्यार से मुस्कुराई।
नीचे झुकी, रोहन के लंड को अपनी नरम, गरम उँगलियों से पकड़ा।
अँगूठे और तर्जनी से सुपाड़े की खाल को बहुत धीरे-धीरे, प्यार से नीचे सरकाया।
गुलाबी, चमकता सुपाड़ा पूरी तरह बाहर आ गया।

फिर उसने होंठ खोले... लाल-गुलाबी होंठ... और पूरा सुपाड़ा मुँह में ले लिया।

रोहन के पूरे शरीर को जैसे बिजली का झटका लगा –
“आआआह्ह्ह्ह्ह... बंसरी... ओह मेरी जान... क्या कर रही हो तुम...”

बंसरी ने आँखें बंद कर लीं।
उसकी जीभ सुपाड़े के चारों ओर घूमने लगी – ऊपर नीचे, दाएँ बाएँ।
नरम होंठ लंड को जकड़े हुए थे।
दो उँगलियाँ और अँगूठा लंड की जड़ को हल्के-हल्के दबाते हुए सहला रहे थे।
वह जानती थी छोटे लंड को कैसे पागल करना है – बहुत धीरे, बहुत प्यार से, बिना जल्दबाजी के।

रोहन के मुँह से लगातार सिसकारियाँ निकल रही थीं –
“उफ्फ़... आह्ह्ह... बंसरी... तुम्हारे मुँह की गर्मी... तुम्हारी जीभ... मैं... मैं पागल हो रहा हूँ... कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतना मजा... आह्ह्ह...”

उसके हाथ बंसरी के घने बालों में फँसे हुए थे। वह धीरे-धीरे बालों को सहला रहा था, कभी-कभी हल्का दबाव दे रहा था।

बंसरी ने ठीक 20 सेकंड तक गहराई से चूसा, फिर मुँह हटा लिया।
फिर अपनी लंबी, गुलाबी जीभ पूरी तरह बाहर निकाली और लंड की पूरी लंबाई को चाटने लगी – नीचे की जड़ से लेकर ऊपर सुपाड़े तक... फिर ऊपर से नीचे... बार-बार... लार से चमकाते हुए।

रोहन की साँसें और तेज़ हो गईं।

फिर बंसरी ने दोनों छोटी-छोटी गेंदों को एक-एक करके मुँह में लिया।
प्यार से चूसा, जीभ से गोल-गोल घुमाया, हल्का-हल्का दबाया।

रोहन की सिसकारी बहुत तेज़ और लंबी निकली –
“आआआआह्ह्ह्ह... बंसरी... मेरी जान... मेरी रानी... मैं... मैं मर जाऊँगा... इतना मजा... आह्ह्ह... तुम जादूगरनी हो... सच में जादूगरनी...”

बंसरी ने ऊपर देखा।
उसके होंठ चमक रहे थे, लार की एक पतली लकीर लंड से जुड़ी हुई थी।
रोहन की आँखों में हल्के आँसू थे, चेहरा पूरी तरह लाल।

बंसरी (बहुत प्यार से, कामुक और मीठी आवाज़ में):
“बोलो न मेरी जान... कैसा लग रहा है...? अपनी बीवी का गरम मुँह... अपनी बीवी की नरम जीभ... अपनी बीवी के लाल होंठ... तुम्हारे लंड को चूसते हुए... कैसा लग रहा है...? मजा आ रहा है ना...?”

रोहन (हाँफते हुए, आवाज़ काँपते हुए, आँखों में प्यार):
“बंसरी... तुम जैसी बीवी पाकर... मेरा पूरा जीवन धन्य हो गया... सच कह रहा हूँ... मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि इतना स्वर्ग... इतना नशा... इतना सुख... मेरी किस्मत में लिखा है... तुम देवी हो... मेरी अपनी देवी... मेरी रानी... मैं तुम्हारा गुलाम हूँ आज से...”

बंसरी (शरारत भरी मुस्कान के साथ):
“यह तो अभी शुरुआत है मेरे प्यारे पति... अभी तो तुम्हें बहुत कुछ करना है... बहुत कुछ चखना है... बहुत कुछ देखना है... मैं पूरी तरह तुम्हारी हूँ... अब देखो... आगे क्या होने वाला है...”

यह कहकर वह पलंग पर चढ़ गई।
अपनी दोनों टाँगें फैलाकर रोहन के चेहरे के ठीक ऊपर बैठ गई।
उसकी गीली, चमकती चूत ठीक रोहन के मुँह और नाक पर आ गई।
और खुद आगे झुककर रोहन के लंड को फिर से मुँह में ले लिया।

69 पोजीशन – पूर्ण रूप से।

रोहन ने एक पल भी नहीं गँवाया।
दोनों हाथ बंसरी के मोटे नितंबों पर रखे, उन्हें फैलाया और जीभ से चूत चाटने लगा।
बंसरी भी पूरी तल्लीनता से लंड चूस रही थी – कभी तेज़ सिर हिलाते हुए, कभी धीरे-धीरे, कभी गेंदें चूसती, कभी सिर्फ़ सुपाड़ा।

पूरे 15 मिनट तक यह सिलसिला चला।
कमरे में सिर्फ़ चूसने की चट-चट, चाटने की आवाज़ें और दोनों की सिसकारियाँ गूँज रही थीं।
बंसरी इतनी सावधानी से चूस रही थी कि रोहन बार-बार किनारे पर पहुँच जाता, लेकिन झड़ नहीं पाता।
उसकी साँसें बहुत तेज़ और भारी हो चुकी थीं।
चूत चाटने की रफ्तार अब बहुत धीमी पड़ चुकी थी।

बंसरी समझ गई कि अब और नहीं चलेगा।
वह धीरे से उसके ऊपर से उठी।
मुस्कुराते हुए रोहन की आँखों में देखा।

बंसरी (मुस्कुराते हुए, प्यार से):
“बोलो न... पहले वाला अच्छा था... या यह वाला अच्छा था...? ईमानदारी से बताओ...”

रोहन (तेज़-तेज़ गहरी साँसें लेते हुए, हाँफते हुए):
“पहले वाला... बहुत अच्छा था... लेकिन यह वाला... लाजवाब था... दोनों... दोनों ही पसंद आए... मैं... मैं स्वर्ग में हूँ बंसरी... सच में स्वर्ग में... तुमने मुझे पागल कर दिया...”

बंसरी ने प्यार से मुस्कुराकर कहा,
“अब तुम मुझे प्यार करो... अपनी बीवी को... पूरी तरह से... जैसे एक पति अपनी पत्नी को पहली रात में करता है... मुझे अपनी बनाओ... पूरी तरह अपनी...”

यह कहकर वह पीठ के बल लेट गई।
दोनों टाँगें चौड़ी करके फैला दीं।
चूत पूरी तरह खुली हुई थी – गीली, चमकती हुई, इंतज़ार कर रही थी।

रोहन तेज़ी से उठा।
पजामे के जेब से कंडोम निकाला, पैकेट फाड़ा, लंड पर चढ़ाया और पलंग पर चढ़ गया।
बंसरी के ऊपर झुका।
लंड को हाथ से पकड़कर चूत के मुहाने पर रखा... और एक झटके से पूरा अंदर पेल दिया।

बंसरी के मुँह से हल्की सी सिसकारी निकली –
“आह्ह्ह... मेरे राजा...”

रोहन ने उसके होंठों को चूसना शुरू कर दिया और तेज़-तेज़ हिलने लगा।
उसकी रफ्तार हर सेकंड बढ़ती गई।
बंसरी समझ चुकी थी – यह किसी भी वक्त झड़ने वाला है।

उसने रोहन को रोकने की कोशिश की –
“धीरे... धीरे करो ना मेरे प्यारे... रुक जाओ... अभी नहीं... थोड़ा और... आह्ह्ह...”

लेकिन रोहन का शरीर काँपने लगा।
उसकी साँसें बहुत तेज़ और बेतरतीब हो गईं।
“बंसरी... मैं... मैं... आ रहा हूँ... आह्ह्ह्ह... बंसरी... मेरी जान... मैं... झड़ रहा हूँ...”

और अगले ही पल... रोहन ने तेज़-तेज़ साँसों के साथ... पूरी तरह झड़ गया।

बंसरी ने मुस्कुराते हुए रोहन के सिर को अपने भरे हुए स्तनों से लगा लिया।
एक हाथ से उसके बालों में उँगलियाँ फिराने लगी, दूसरे हाथ से उसकी पीठ सहलाने लगी।

अंदर से वह बहुत गहरी मुस्कान मुस्कुरा रही थी।
“पहली रात... पहला राउंड... सिर्फ़ 55 सेकंड चुदाई... लेकिन कोई बात नहीं... अभी तो रात बहुत लंबी है... मैं इसे पूरा सिखा दूँगी... अपना असली रूप दिखा दूँगी...”

रात अभी बहुत लंबी थी...
और बंसरी की छिपी हुई ज्वाला... अभी सिर्फ़ पहली लपट थी।


(आपको यह अध्याय कैसा लगा कमेंट कर के बताएं)

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